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अ॒पो दे॒वीरुप॑सृज॒ मधु॑मतीरय॒क्ष्माय॑ प्र॒जाभ्यः॑। तासा॑मा॒स्थाना॒दुज्जि॑हता॒मोष॑धयः सुपिप्प॒लाः ॥३८ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒पः। दे॒वीः। उप॑। सृ॒ज॒। मधु॑मती॒रिति॒ मधु॑ऽमतीः। अ॒य॒क्ष्माय॑। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑। तासा॑म्। आ॒स्थाना॒दित्या॒ऽस्थाना॑त्। उत्। जि॒ह॒ता॒म्। ओष॑धयः। सु॒पि॒प्प॒ला इति॑ सुऽपिप्प॒लाः ॥३८ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:11» मन्त्र:38


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

आगे जल आदि पदार्थों के शोधने से प्रजा में क्या होता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे श्रेष्ठ वैद्य पुरुष ! आप (मधुमतीः) प्रशंसित मधुर आदि गुणयुक्त (देवीः) पवित्र (अपः) जलों को (उपसृज) उत्पन्न कीजिये जिस से (तासाम्) उन जलों के (आस्थानात्) आश्रय से (सुपिप्पलाः) सुन्दर फलोंवाली (ओषधयः) सोमलता आदि ओषधियों को (प्रजाभ्यः) रक्षा करने योग्य प्राणियों के (अयक्ष्माय) यक्ष्मा आदि रोगों की निवृत्ति के लिये (उज्जिहताम्) प्राप्त हूजिये ॥३८ ॥
भावार्थभाषाः - राजा को चाहिये कि दो प्रकार के वैद्य रक्खे। एक तो सुगन्ध आदि पदार्थों के होम से वायु वर्षा जल और ओषधियों को शुद्ध करें। दूसरे श्रेष्ठ विद्वान् वैद्य होकर निदान आदि के द्वारा सब प्राणियों को रोगरहित रक्खें। इस कर्म के विना संसार में सार्वजनिक सुख नहीं हो सकता ॥३८ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ जलादिपदार्थशोधनेन प्रजासु किं जायत इत्याह ॥

अन्वय:

(अपः) जलानि (देवीः) दिव्यानि पवित्राणि (उप) (सृज) निष्पादय (मधुमतीः) प्रशस्ता मधवो मधुरादयो गुणा विद्यन्ते यासु ताः (अयक्ष्माय) यक्ष्मादिरोगनिवारणाय (प्रजाभ्यः) पालनीयाभ्यः (तासाम्) अपाम् (आस्थानात्) आस्थायाः (उत्) (जिहताम्) प्राप्नुवन्तु (ओषधयः) सोमादयः (सुपिप्पलाः) शोभनानि पिप्पलानि फलानि यासां ताः। [अयं मन्त्रः शत०६.४.३.१ व्याख्यातः] ॥३८ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे सद्वैद्य ! त्वं मधुमतीर्देवीरप उपसृज यतस्तासामास्थानात् सुपिप्पला ओषधयः प्रजाभ्योऽयक्ष्मायोज्जिहताम् ॥३८ ॥
भावार्थभाषाः - राज्ञा द्विविधा वैद्याः संरक्षणीयाः। एके सुगन्धादिहोमेन वायुवृष्ट्योषधीः शुद्धाः संपादयेयुः। अपरे सन्तो भिषजो विद्वांसो निदानादिद्वारा सर्वान् प्राणिनोऽरोगान् सततं रक्षयेयुः। नैतत्कर्मणा विना समष्टिसुखं कदाचित् संपद्यते ॥३८ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - राजाजवळ दोन प्रकारचे वैद्य असावेत. एका वैद्याने सुगंधित पदार्थ यज्ञात टाकून वायू, वर्षा, जल व औषधी यांना शुद्ध करावे व दुसऱ्या श्रेष्ठ विद्वान वैद्याने रोगाचे निदान करून सर्व प्राण्यांना रोगरहित करावे. या कर्माखेरीज संसारात सार्वजनिक सुख मिळू शकत नाही.