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उद॑क्रमीद् द्रविणो॒दा वा॒ज्यर्वाकः॒ सुलो॒कꣳ सुकृ॑तं पृथि॒व्याम्। ततः॑ खनेम सु॒प्रती॑कम॒ग्निꣳ स्वो॒ रुहा॑णा॒ऽअधि॒ नाक॑मुत्त॒मम् ॥२२ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत्। अ॒क्र॒मी॒त्। द्र॒वि॒णो॒दा इति॑ द्रविणः॒ऽदाः। वा॒जी। अर्वा॑। अक॒रित्यकः॑। सु। लो॒कम्। सुकृ॑त॒मिति॒ सुऽकृ॑तम्। पृ॒थि॒व्याम्। ततः॑। ख॒ने॒म॒। सु॒प्रती॑क॒मिति॑ सु॒ऽप्रती॑कम्। अ॒ग्निम्। स्व᳖ इति॑ स्वः᳖। रुहा॑णाः। अधि॑। नाक॑म्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥२२ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:11» मन्त्र:22


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्य इस संसार में किस के समान हो के किस को प्राप्त हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे भूगर्भ विद्या के जानने हारे विद्वन् ! (द्रविणोदाः) धनदाता आप जैसे (वाजी) बलवाला (अर्वा) घोड़ा ऊपर को उछलता है, वैसे (पृथिव्याम्) पृथिवी के बीच (अधि) (उदक्रमीत्) सब से अधिक उन्नति को प्राप्त हूजिये (सुकृतम्) धर्माचरण से प्राप्त होने योग्य (सुलोकम्) अच्छा देखने योग्य (उत्तमम्) अति श्रेष्ठ (नाकम्) सब दुःखों से रहित सुख को (अकः) सिद्ध कीजिये (ततः) इसके पश्चात् (स्वः) सुखपूर्वक (रुहाणाः) प्रकट होते हुए हम लोग भी इस पृथिवी पर (सुप्रतीकम्) सुन्दर प्रतीति का विषय (अग्निम्) व्यापक बिजुली रूप अग्नि का (खनेम) खोज करें ॥२२ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पृथिवी पर घोड़े अच्छी-अच्छी चाल चलते हैं, वैसे हम तुम सब मिल कर पुरुषार्थी हो पृथिवी आदि की पदार्थविद्या को प्राप्त हो और दुःखों को दूर करके सब से उत्तम सुख को प्राप्त हों ॥२२ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्या इह किंवद् भूत्वा किं प्राप्नुयुरित्याह ॥

अन्वय:

(उत्) (अक्रमीत्) उत्तमतया क्रमणं कुर्यात् (द्रविणोदाः) धनदाता (वाजी) वेगवान् (अर्वा) अश्व इव (अकः) कुर्यात् (सु) (लोकम्) द्रष्टव्यम् (सुकृतम्) धर्माचारेण प्राप्यम् (पृथिव्याम्) (ततः) (खनेम) (सुप्रतीकम्) शोभना प्रतीतिर्यस्य तम् (अग्निम्) व्यापकं विद्युदाख्यम् (स्वः) सुखम् (रुहाणाः) प्रादुर्भवन्तः (अधि) (नाकम्) अविद्यमानदुःखम् (उत्तमम्) अतिश्रेष्ठम्। [अयं मन्त्रः शत०६.३.३.१४ व्याख्यातः] ॥२२ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे भूगर्भविद्याविद्विद्वन् ! द्रविणोदा भवान् यथा वाज्यर्वा तथा पृथिव्यामध्युदक्रमीत्, सुलोकं सुकृतमुत्तमं नाकमकः सिद्धं कुर्य्यात्। ततः स्वो रुहाणा वयमप्यस्यां सुप्रतीकमग्निं खनेम ॥२२ ॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्याः ! सर्वे वयं मिलित्वा यथा पृथिव्यामश्वो विक्रमते तथा पुरुषार्थिनो भूत्वा पृथिव्यादिविद्यां प्राप्य दुःखान्युत्क्राम्य सर्वोत्तमं सुखं प्राप्नुयाम ॥२२ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. हे माणसांनो, भूमीवर ज्याप्रमाणे घोड्याची चाल वेगवान असते तसेच आपण सर्वांनीही गतिमान होऊन पुरुषार्थी बनावे. पृथ्वीवरील पदार्थविद्या प्राप्त करावी व दुःख दूर करून उत्तम सुख प्राप्त करावे.