वांछित मन्त्र चुनें
आर्चिक को चुनें

अ꣣स्म꣡भ्यं꣢ त्वा वसु꣣वि꣡द꣢म꣣भि꣡ वाणी꣢꣯रनूषत । गो꣡भि꣢ष्टे꣣ व꣡र्ण꣢म꣣भि꣡ वा꣢सयामसि ॥५७५॥

(यदि आप उपरोक्त फ़ॉन्ट ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं तो कृपया अपने ऑपरेटिंग सिस्टम को अपग्रेड करें)
स्वर-रहित-मन्त्र

अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत । गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि ॥५७५॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । त्वा꣣ । वसुवि꣡द꣢म् । व꣣सु । वि꣡द꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । वा꣡णीः꣢ । अ꣣नूषत । गो꣡भिः꣢꣯ । ते꣣ । व꣡र्ण꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । वा꣣सयामसि ॥५७५॥

सामवेद » - पूर्वार्चिकः » मन्त्र संख्या - 575 | (कौथोम) 6 » 2 » 3 » 10 | (रानायाणीय) 5 » 10 » 10


बार पढ़ा गया

हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में सोमनामक परमात्मा वा वैद्य को कहा गया है।

पदार्थान्वयभाषाः -

प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे सोम परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (वसुविदम्) ऐश्वर्य प्राप्त करानेवाले (त्वा अभि) आपको लक्ष्य करके (वाणीः) हमारी वाणियाँ (अनूषत) स्तुति कर रही हैं। हम (गोभिः) वेद-वाणियों द्वारा (ते) आपके (वर्णम्) स्वरूप को (अभिवासयामसि) अपने अन्दर बसाते हैं ॥ द्वितीय—वैद्य के पक्ष में। हे चिकित्सा के लिए सोम आदि ओषधियों का रस अभिषुत करनेवाले वैद्यराज ! (अस्मभ्यम्) हम रोगियों के लिए (वसुविदम्) स्वास्थ्य-सम्पत्ति प्राप्त करानेवाले (त्वा अभि) आपको लक्ष्य करके (वाणीः) हम कृतज्ञों की वाणियाँ (अनूषत) आपकी स्तुति कर रही हैं, अर्थात् आपके आयुर्वेद के ज्ञान की प्रशंसा कर रही हैं—यह रोगियों की उक्ति है। आगे वैद्य कहता है—हे त्वचारोग से ग्रस्त रोगी ! (गोभिः) गाय से प्राप्त होनेवाले दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर रूप पञ्च गव्यों से हम (ते) तेरे, तेरी त्वचा के (वर्णम्) स्वाभाविक रंग को (अभिवासयामसि) पुनः तुझमें बसा देते हैं, अर्थात् कुष्ठ आदि रोग के कारण तेरी त्वचा के विकृत हुए रूप को दूर करके त्वचा का स्वाभाविक रंग ला देते हैं। इससे कुष्ठ आदि त्वचा-रोगों की पञ्चगव्य द्वारा चिकित्सा की जाने की सूचना मिलती है ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१०॥

भावार्थभाषाः -

सब ऐश्वर्य देनेवाले परमात्मा के सत्य, शिव, सुन्दर, सच्चिदानन्दमय स्वरूप को हमें अपने हृदय में धारण करना चाहिए। इसी प्रकार श्रेष्ठ वैद्यों की बतायी रीति से पञ्चगव्यों द्वारा चिकित्सा से त्वचा आदि के रोग दूर करने चाहिएँ ॥१०॥

बार पढ़ा गया

संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ सोमाख्यं परमात्मानं वैद्यं चाह।

पदार्थान्वयभाषाः -

प्रथमः—परमात्मपरः। हे सोमाख्य परमात्मन् ! (अस्मभ्यम्) नः (वसुविदम्) ऐश्वर्यस्य लम्भकम् (त्वा अभि) त्वाम् अभिलक्ष्य (वाणीः) अस्माकं वाण्यः (अनूषत) स्तुवन्ति। णु स्तुतौ, लडर्थे लुङि छान्दसं रूपम्। वयम् (गोभिः) वेदवाग्भिः (ते) तव (वर्णम्) स्वरूपम् (अभिवासयामसि) स्वात्मनि निवासयामः ॥ अथ द्वितीयः—वैद्यपरः। यः अभिषुणोति सोमाद्योषधीनां रसान् भैषज्यार्थं स सोमो वैद्यः।२ ‘हे वैद्यराज ! (अस्मभ्यम्) रुग्णेभ्यो नः (वसुविदम्) स्वास्थ्यसम्पत्प्रापकम् (त्वा अभि) त्वामभिलक्ष्य (वाणीः) कृतज्ञानामस्माकं वाचः (अनूषत) स्तुवन्ति, तव आयुर्वेदज्ञानं प्रशंसन्ति’ इत्यातुराणामुक्तिः। अथ वैद्योक्तिः—हे त्वग्रोगग्रस्त जन ! (गोभिः) गोविकारैः पयोदधिघृतमूत्रगोमयलक्षणैः वयम् (ते) तव (वर्णम्) स्वाभाविकं त्वग्रूपम् (अभिवासयामसि) त्वयि निवासयामः, कुष्ठादिरोगवशाद् विकृतं तव त्वग्रूपम् अपनीय स्वाभाविकं त्वग्वर्णं जनयाम इति भावः। एतेन कुष्ठादीनां त्वग्रोगाणां पञ्चगव्येन चिकित्सा सूचिता भवति ॥१०॥ अत्र श्लेषालङ्कारः ॥१०॥

भावार्थभाषाः -

सर्वैश्वर्यप्रदस्य परमात्मनः सत्यं शिवं सुन्दरं सच्चिदानन्दमयं स्वरूपमस्माभिः स्वहृदये धारणीयम्। तथैव सद्वैद्योक्तरीत्या पञ्चगव्यचिकित्सया त्वगादीनां रोगा अपनेयाः ॥१०॥

टिप्पणी: १. ऋ० ९।१०४।४ ऋषी पर्वतनारदौ, द्वे शिखण्डिन्यौ वा काश्यप्यावप्सरसौ। २. सोमम् सोमलताद्योषधिसारपातारम् (वैद्यम्) इति ऋ० २।११।११ भाष्ये द०।