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देवता: इन्द्रः ऋषि: शंयुर्बार्हस्पत्यः छन्द: गायत्री स्वर: षड्जः काण्ड:

त꣡द्वो꣢ गाय सु꣣ते꣡ सचा꣢꣯ पुरुहू꣣ता꣢य꣣ स꣡त्व꣢ने । शं꣢꣫ यद्गवे꣣ न꣢ शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने । शं यद्गवे न शाकिने ॥१६६६॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त꣢त् । वः꣣ । गाय । सुते꣢ । स꣡चा꣢꣯ । पु꣣रुहूता꣡य꣢ । पु꣣रु । हूता꣡य꣢ । स꣡त्व꣢꣯ने । शम् । यत् । ग꣡वे꣢꣯ । न । शा꣣कि꣡ने꣢ ॥१६६६॥

सामवेद » - उत्तरार्चिकः » मन्त्र संख्या - 1666 | (कौथोम) 8 » 2 » 4 » 1 | (रानायाणीय) 18 » 1 » 4 » 1


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ११५ क्रमाङ्क पर परमात्मा के गान के विषय में की जा चुकी है। यहाँ भी वही विषय है।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे साथी ! (वः) तू (सुते) श्रद्धा-रस के उत्पन्न होने पर (सचा) अन्य स्तोताओं के साथ (पुरुहूताय) बहुतों से बुलाये गये, (सत्वने) बलशाली इन्द्र परमात्मा के लिए (तत् गाय) उसी गीत को गा (यत्) जो गीत (शाकिने गवे न) घास-भक्षी बैल के समान (शाकिने) शक्तिमान् (गवे) तुझ स्तोता के लिए (शम्) शान्तिदायक हो ॥१॥ यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थभाषाः -

श्रद्धा से भरे हुए चित्त से जिस स्तुति-गीत का उपहार जगदीश्वर को दिया जाता है, वह स्तोता के लिए बहुत कल्याणकारी होता है ॥१॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ११५ क्रमाङ्के परमात्मगानविषये व्याख्याता। अत्रापि तमेव विषयमाह।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे सखे ! वः त्वम् [अत्र व्यत्ययेन प्रथमायामेकवचनस्य वसादेशः।] (सुते) श्रद्धारसेऽभिषुते सति (सचा) अन्यैः स्तोतृभिः सह मिलित्वा (पुरुहूताय) बहुभिराहूताय, (सत्वने) बलशालिने इन्द्राय परमात्मने (तत् गाय) तद् गीतं गानविषयीकुरु (यत्) गीतम् (शाकिने गवे न) घासभक्षिणे वृषभाय इव (शाकिने) शक्तिमते (गवे) स्तोत्रे तुभ्यम् (शम्) शान्तिदायकं भवेत् ॥१॥२ अत्र श्लिष्टोपमालङ्कारः ॥१॥

भावार्थभाषाः -

श्रद्धानिर्भरेण चेतसा यत् स्तुतिगीतं जगदीश्वरायोपह्रियते तत् स्तोत्रे महत् कल्याणकरं जायते ॥१॥