वांछित मन्त्र चुनें
आर्चिक को चुनें

अ꣢र꣣म꣡श्वा꣢य गायत꣣ श्रु꣡त꣢क꣣क्षा꣢रं꣣ ग꣡वे꣢ । अ꣢र꣣मि꣡न्द्र꣢स्य꣣ धा꣡म्ने꣢ ॥११८॥

(यदि आप उपरोक्त फ़ॉन्ट ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं तो कृपया अपने ऑपरेटिंग सिस्टम को अपग्रेड करें)
स्वर-रहित-मन्त्र

अरमश्वाय गायत श्रुतकक्षारं गवे । अरमिन्द्रस्य धाम्ने ॥११८॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ꣡र꣢꣯म् । अ꣡श्वा꣢꣯य । गा꣣यत । श्रु꣡तक꣢꣯क्षारम् । श्रु꣡त꣢꣯ । क꣣क्ष । अ꣡र꣢꣯म् । ग꣡वे꣢꣯ । अ꣡र꣢꣯म् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । धा꣡म्ने꣢꣯ ॥११८॥

सामवेद » - पूर्वार्चिकः » मन्त्र संख्या - 118 | (कौथोम) 2 » 1 » 3 » 4 | (रानायाणीय) 2 » 1 » 4


बार पढ़ा गया

हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अगले मन्त्र में मनुष्यों को प्रेरणा की गयी है।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे (श्रुतकक्ष) वेद को अपनी बगल में या मनरूप कोठे में रखनेवाले वेदानुगामी मनुष्य ! तू और तेरे सखा मिलकर (अरम्) पर्याप्तरूप से (अश्वाय) घोड़े, वायु, विद्युत्, अग्नि, बादल, प्राण आदि के लिए (गायत) वाणी को प्रेरित करो अर्थात् इनके गुण-कर्मों का वर्णन करो। (अरम्) पर्याप्त रूप से (गवे) गाय, बैल, द्युलोक, सूर्य, भूमि, चन्द्रमा, जीवात्मा, वाणी, इन्द्रियों आदि के लिए (गायत) वाणी को प्रेरित करो अर्थात् इनके गुण-कर्मों का वर्णन करो। (अरम्) पर्याप्त रूप से (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (धाम्ने) तेज के लिए(गायत) वाणी को प्रेरित करो अर्थात् उसके महत्त्व का वर्णन करो ॥४॥

भावार्थभाषाः -

परमेश्वर की सृष्टि में उसके रचे हुए जो विविध पदार्थ हैं उनका और परमेश्वर के तेज का ज्ञान तथा महत्त्व का वर्णन सबको करना चाहिए ॥४॥

बार पढ़ा गया

संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ जनाः प्रेर्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे (श्रुतकक्ष।२) श्रुतो वेदः कक्षे बाहुमूले मनःप्रकोष्ठे वा यस्य तादृश वेदानुगामिन् ! त्वं तव सखायश्च संभूय (अरम्) अलं, पर्याप्तम् (अश्वाय३) अश्वपदवाच्यघोटक-वायु-विद्युद्-अग्नि-पर्जन्य-प्राणादिकाय (गायत) वाचं प्रेरयत, तद्गुणकर्माणि वर्णयत। (अरम्) पर्याप्तम् (गवे) गोपदवाच्यधेनु-वृषभ-द्युलोक-सूर्य-पृथिवी-चन्द्र-जीवात्म-वाग्-इन्द्रियादि- काय (गायत) वाचं प्रेरयत, तद्गुणकर्माणि वर्णयत। (अरम्) पर्याप्तम् (इन्द्रस्य) परमेश्वरस्य (धाम्ने) तेजसे (गायत) वाचं प्रेरयत, तन्महत्त्वं वर्णयत ॥४॥

भावार्थभाषाः -

परमेश्वरस्य सृष्टौ तद्रचिता ये विविधपदार्थाः सन्ति तेषां पारमेश्वरतेजसश्च ज्ञानं तन्महत्त्ववर्णनं च सर्वैः कार्यम् ॥४॥

टिप्पणी: १. ऋ० ८।९२।२५, गायत श्रुतकक्षारं इत्यत्र गायति श्रुतकक्षो अरं इति पाठः। ऋषिः श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। २. हे श्रुतकक्षाः श्रुतकक्षस्य मम पुत्राः—इति वि०। श्रुतकक्षेति आत्मानमेव सम्बोधयति ऋषिः—इति भ०, एतदेव सायणाभिमतम्। ३. अश्वस्यार्थाय, गोरर्थाय, इन्द्रस्य यत् स्थानं स्वर्गाख्यं तस्य चार्थाय—इति वि०। अश्वान् लब्धुम्.... गोलाभार्थम्,,,, धाम्ने स्थानाय, गृहलाभार्थम्—इति भ०।