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आ यद्वां॒ योष॑णा॒ रथ॒मति॑ष्ठद्वाजिनीवसू । विश्वा॑न्यश्विना यु॒वं प्र धी॒तान्य॑गच्छतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā yad vāṁ yoṣaṇā ratham atiṣṭhad vājinīvasū | viśvāny aśvinā yuvam pra dhītāny agacchatam ||

पद पाठ

आ । यत् । वा॒म् । योष॑णा । रथ॑म् । अति॑ष्ठत् । वा॒जि॒नी॒व॒सू॒ इति॑ वाजिनीऽवसू । विश्वा॑नि । अ॒श्वि॒ना॒ । यु॒वम् । प्र । धी॒तानि॑ । अ॒ग॒च्छ॒त॒म् ॥ ८.८.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:8» मन्त्र:10 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:26» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:10


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनीवसू) हे सर्वविद्याधन हे धनेश (अश्विना) अश्विद्वय ! राजा और अमात्य (यद्) जब (वाम्) आप दोनों के (रथम्) रमणीय शरीररूप रथ को (योषणा) मिश्रणकरी, विभागकरी और परमप्रीतिकरी विद्या (अतिष्ठत्) भूषित करती है, तब ही (विश्वानि) समस्त (धीतानि) विज्ञान (युवम्) आप दोनों को (प्र+अगच्छतम्) प्राप्त होते हैं अर्थात् तब समस्त विज्ञानों के तत्त्व समझने लगते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - राजा को सर्व विद्याएँ उपार्जन करनी चाहियें ॥१०॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनीवसू) हे सेनारूप धनवाले ! (यत्) जब (वाम्) आपके (रथम्) रथ पर (योषणा) विजयलक्ष्मीरूप स्त्री (आतिष्ठत्) चढ़ जाती है, तब (अश्विना) हे व्यापक ! (युवम्) आप (विश्वानि, प्रधीतानि) सकल अभिलषितों को (अगच्छतम्) पा जाते हैं ॥१०॥
भावार्थभाषाः - हे सेनाध्यक्ष तथा सभाध्यक्ष ! आप पर्याप्तकाम होने से आपकी सब इच्छा पूर्ण हैं, हे भगवन् ! आप हमारी कामनाओं की पूर्ति के लिये भी यत्नवान् हों, यह प्रार्थना है ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

योषणा का अश्विनी देवों के रथ पर अधिष्ठान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वाजिनीवसू) = शक्ति व ज्ञानरूप धनवाले प्राणापानो! (यद्) = जब (वाम्) = आपकी साधनावाले (रथम्) = इस शरीर-रथ पर (योषणा) = सब बुराइयों का अमिश्रण व अच्छाइयों का मिश्रण करनेवाली यह वेदवाणी [सूर्या] (आतिष्ठतः) = अधिष्ठित होती है। तो हे (अश्विना) = प्राणापानो ! (युवम्) = आप (विश्वानि) = सब (धीतानि) = अभिलषितों को (प्र अगच्छतम्) = प्राप्त हो जाते हो। [२] प्राणसाधना से ज्ञानदीप्ति होने के कारण यह शरीर रथ 'सूर्या' (बुद्धि का प्रकाश) का अधिष्ठान बनता है। । उस समय कोई अभिलषित वस्तु अप्राप्य नहीं रहती ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से ज्ञान की दीप्ति होती है और सब अभिलषित पूर्ण होते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमेवार्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वाजिनीवसू=वाजिनी सुविद्यैव वसूनि धनानि ययोस्तौ विद्याधनौ हे महाधनेशौ ! अश्विनौ ! यद्=यदा। वाम्=युवयोः। रथम्=शरीररूपं रमणीयं वाहनम्। योषणा=मिश्रणकरी विभागकरी तथा परमप्रीतिप्रदा च विद्या। अतिष्ठत्=प्राप्नोति विभूषयति तदैव। विश्वानि=सर्वाणि। धीतानि=धियो विज्ञानानि। युवम्=युवाम्। प्रागच्छतम्=प्रकर्षेण प्राप्तानि भवन्ति ॥१०॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजिनीवसू) हे सेनाधनौ ! (यत्) यदा (वाम्) युवयोः (रथम्) यानम् (योषणा) विजयलक्ष्मीः (आतिष्ठत्) आरोहति तदा (अश्विना) हे व्यापकौ (युवम्) युवाम् (विश्वानि, प्रधीतानि) सकलान्यभिलषितानि (अगच्छतम्) प्राप्तवन्तौ ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, when the youthful dawn of a new day ascends your chariot with you, then, O divine harbingers of wealth and energy, you reach all that what the world thinks of for self-fulfilment.