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वरे॑थे अ॒ग्निमा॒तपो॒ वद॑ते व॒ल्ग्वत्र॑ये । अन्ति॒ षद्भू॑तु वा॒मव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

varethe agnim ātapo vadate valgv atraye | anti ṣad bhūtu vām avaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वरे॑थे । अ॒ग्निम् । आ॒ऽतपः॑ । वद॑ते । व॒ल्गु । अत्र॑ये । अन्ति॑ । सत् । भू॒तु॒ । वा॒म् । अवः॑ ॥ ८.७३.८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:73» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:8» मन्त्र:8


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शिव शंकर शर्मा

फिर उसी अर्थ को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे महाराज तथा अमात्य ! (यद्) जिस कारण इस समय आपकी स्थिति का ज्ञान हम लोगों को नहीं है, अतः (अद्य) आज आप दोनों (कर्हि+कर्हि+चित्) कहीं-कहीं होवें, वहाँ से आकर (इमम्) हमारी इस (हवम्) प्रार्थना को (शुश्रूयातम्) पुनः-पुनः सुनें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वासनाग्नि से तप्त न होना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्राणापानो! आप (वल्गु वदते) = मधुर स्तुतिवचनों का उच्चारण करते हुए (अत्रये) = काम- क्रोध व लोभ से ऊपर उठे व्यक्ति के लिए (अग्निम्) = वासनाओं की अग्नि को (आतपः) = सन्तापक शक्ति से (वरेथे) = निवारित करते हो, अर्थात् प्राणसाधना से यह अत्रि कामाग्नि [वासनाग्नि] से संतप्त नहीं होता। [२] हे प्राणापानो! (वाम्) = आपका (सत् अवः) = उत्तम रक्षण (अन्ति भूतु) = हमें सदा समीपता से प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना मनुष्य को वासनीय से संतप्त नहीं होने देती ।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तमर्थमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ ! यद्=यस्मात् स्थितिरस्माभिरिदानीं न ज्ञायते। अतः। अद्य+कर्हि=कस्मिंश्चित् स्थाने। कर्हि=कस्मिंश्चित् स्थाने। द्विरुक्तिर्दृढार्था। भवतम्। तस्मादागत्या। अस्माकम् इमं+हवं=प्रार्थनाम्। शुश्रूयातम्=पुनः पुनः शृणुतम्। शिष्टमुक्तम् ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, harbingers of protection and relief for the deprived and underprivileged in matters of care, maintenance and education, bring help to the persuasive supplicants and remove the gusts of scorching heat and air from their head and heart. Let your protections be instantly available at the closest.