समु॒ त्ये म॑ह॒तीर॒पः सं क्षो॒णी समु॒ सूर्य॑म् । सं वज्रं॑ पर्व॒शो द॑धुः ॥
sam u tye mahatīr apaḥ saṁ kṣoṇī sam u sūryam | saṁ vajram parvaśo dadhuḥ ||
सम् । ऊँ॒ इति॑ । त्ये । म॒ह॒तीः । अ॒पः । सम् । क्षो॒णी । सम् । ऊँ॒ इति॑ । सूर्य॑म् । सम् । वज्र॑म् । प॒र्व॒ऽशः । द॒धुः॒ ॥ ८.७.२२
शिव शंकर शर्मा
वायु का स्वभाव दिखलाते हैं।
आर्यमुनि
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
[१] (त्ये) = गत मन्त्र के अनुसार प्राणसाधना से 'प्रभु-स्तवन की वृत्ति तथा सत्य के बल को' अपनानेवाले लोग (उ) = निश्चय से (महनीः अपः) = महत्त्वपूर्ण रेतःकणरूप जलों को (संदधुः) = धारण करते हैं। प्राणसाधना ही रेतःकणों के रक्षण का कारण बनती है। रेतःकणों के रक्षण के द्वारा (क्षोणी) = इस शरीररूप पृथिवी को (सम्) = धारण करते हैं (उ) = और (सूर्यम्) = सूर्य को (सम्) = धारण करते हैं। अध्यात्म में यह सूर्य 'ज्ञान का सूर्य' है। इस सूर्य के ये धारण करनेवाले होते हैं। [२] ये लोग इस प्रकार 'रेतःकणों, शरीर तथा ज्ञानसूर्य' को धारण करके (पर्वशः) = एक-एक पर्व में (वज्रं दधुः) = क्रियाशीलतारूप वज्र को धारण करते हैं। इनके सब अंग क्रियाशील होते हैं। ये जीवन को क्रियामय बनाये रखते हैं।
शिव शंकर शर्मा
वायुस्वभावं दर्शयति।
