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न यस्य॑ ते शवसान स॒ख्यमा॒नंश॒ मर्त्य॑: । नकि॒: शवां॑सि ते नशत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

na yasya te śavasāna sakhyam ānaṁśa martyaḥ | nakiḥ śavāṁsi te naśat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न । यस्य॑ । ते॒ । श॒व॒सा॒न॒ । स॒ख्यम् । आ॒नंश॑ । मर्त्यः॑ । नकिः॑ । शवां॑सि । ते॒ । न॒श॒त् ॥ ८.६८.८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:68» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:5» वर्ग:2» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:8


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - (नरः) मनुष्य (यम्+सदावृधम्) जिस सदा बढ़ाने सदा सुख पहुँचानेवाले और सदा जगत्पोषक ईश्वर की (स्वर्मीळहेषु) संकटों, सुखों और जीवन-यात्रा में (अभिष्टये) स्वमनोरथ सिद्धि के लिये और (ऊतये) साहाय्य के लिये (नाना) विविध प्रकार (हवन्ते) स्तुति, पूजा, पाठ और कीर्तिगान करते हैं, उसको मैं भी भजता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - उसका महान् यश है, जिसको सब ही गा रहे हैं। हम भी सदा उसी की उपासना करें ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

न मित्रता- न बल

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (शवसान) = शक्तिशालिन् प्रभो ! (यस्य ते) = जिन आपके (सख्यं) = मित्रभाव को (मर्त्यः) = विषयों के पीछे मरनेवाला मनुष्य (न आनंश) = नहीं प्राप्त करता, परिणामतः (ते शवांसि) = आपके बलों को भी (नकिः नशत्) = नहीं व्याप्त करता। [२] प्रभु का मित्र बननेवाला ही प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न बनता है। प्रभु की मित्रता से दूर होकर प्रकृति में फंसकर वह अपनी शक्तियों को जीर्ण कर लेता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु की मित्रता को प्राप्त करने के लिए यत्नशील हैं। ऐसा करने पर हम प्रभु की शक्ति से शक्तिसम्पन्न होंगे।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - नरः=नराः। स्वर्मीळहेषु=संग्रामेषु=जीवनसमरेषु। अभिष्टये=स्वस्वकल्याणाय। यं सदावृधम्=वर्षयितारम् ईश्वरम्। ऊतये=साहाय्यार्थञ्च। नाना=बहुप्रकारम्। हवन्ते=शब्दायते=स्तुवन्तीत्यर्थः। तमहं स्तौमि ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lord of universal power, no mortal has ever been able to attain equal fellowship with you, then who can claim to attain equality with your power and potential?