श्या॒वाश्व॑स्य सुन्व॒तोऽत्री॑णां शृणुतं॒ हव॑म् । इन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑पीतये ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
śyāvāśvasya sunvato trīṇāṁ śṛṇutaṁ havam | indrāgnī somapītaye ||
पद पाठ
श्या॒वऽअ॑श्वस्य । सु॒न्व॒तः । अत्री॑णाम् । शृ॒णु॒त॒म् । हव॑म् । इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । सोम॑ऽपीतये ॥ ८.३८.८
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:38» मन्त्र:8
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:21» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:8
0 बार पढ़ा गया
शिव शंकर शर्मा
पुनः उसी विषय को कहते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - (नरा) हे नेता (इन्द्राग्नी) राजन् तथा दूत ! आप (इमा+सवना) इन प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन और सायंसवन तीनों दैनिक यज्ञों को (जुषेथाम्) सेवें (यैः) जिनसे (हव्यानि) दातव्य द्रव्यों को आप (ऊहथुः) इतस्ततः पहुँचाया करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - यज्ञादि शुभकर्मों में जिस-२ उद्देश्य से जो-२ दान हो, उनको वहाँ-२ राजा और दूत पहुँचाने का प्रयत्न करें ॥५॥
0 बार पढ़ा गया
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
श्यावाश्व व अत्रि
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (इन्द्राग्नी) = बल व प्रकाश के दिव्यभावो ! आप (सुन्वतः) = सोम का सम्पादन करते हुए (श्यावाश्वस्य) = गतिशील इन्द्रियाश्वोंवाले पुरुष की तथा (अत्रीणां) = काम-क्रोध-लोभ से रहित पुरुषों की (हवम्) = पुकार को (शृणुतं) = सुनो। वस्तुतः ये इन्द्र और अग्नि 'श्यावाश्व व अत्रि' को ही प्राप्त होते हैं। [२] हे इन्द्राग्नी ! आप (सोमपीतये) = सोम के रक्षण के लिए होओ। सोमरक्षण द्वारा ही आप बलसम्पन्न करके मुझे 'श्यावाश्व' बनाते हैं तथा प्रकाशसम्पन्न करके आप मुझे 'अत्रि' बनाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- इन्द्राग्नी की आराधना मुझे गतिशील इन्द्रियाश्वोंवाला 'श्यावाश्व' बनाए तथा काम, क्रोध, लोभ से रहित करके यह मुझे 'अत्रि' बनाए।
0 बार पढ़ा गया
शिव शंकर शर्मा
पुनस्तदेवाह।
पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्राग्नी ! हे नरा=नेतारौ ! इमा=इमानि। सवना सवनानि=प्रात्यहिकयज्ञान्। जुषेथाम्=सेवेथाम्। युवाम्। यैः सवनैः। हव्यानि=दातव्यद्रव्याणि। ऊहथुः=इतस्ततो वहथः ॥५॥
0 बार पढ़ा गया
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Agni, listen to the call of the dynamic scholar and poet who offers the soma of yajnic homage, and honour the call of the leaders of thrice won freedom of the body, mind and soul so that you may enjoy the soma celebration of the nation at the yajna vedi.
