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व॒यं ते॑ अ॒स्य वृ॑त्रहन्वि॒द्याम॑ शूर॒ नव्य॑सः । वसो॑: स्पा॒र्हस्य॑ पुरुहूत॒ राध॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayaṁ te asya vṛtrahan vidyāma śūra navyasaḥ | vasoḥ spārhasya puruhūta rādhasaḥ ||

पद पाठ

व॒यम् । ते॒ । अ॒स्य । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । वि॒द्याम॑ । शू॒र॒ । नव्य॑सः । वसोः॑ । स्पा॒र्हस्य॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । राध॑सः ॥ ८.२४.८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:24» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:16» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:8


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शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी वस्तु को दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (वृत्रहन्) हे विघ्नविनाशक ! (शूर) हे महावीर ! (पुरुहूत) हे बहुपूजित इन्द्र ! (ते) तेरे (वसोः) धनों को (विद्याम) प्राप्त करें, (नव्यसः) जो नवीन-२ हों, (स्पार्हस्य) सबके स्पृहणीय हों और (राधसः) कल्याण के साधक हों ॥८॥
भावार्थभाषाः - वही धन उपार्जनीय है, जो सर्वप्रिय और हितकारी हो ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'स्तुत्य - स्पृहणीय कार्यसाधक' धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वृत्रहन्) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले, शूर-शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो ! (वयम्) = हम (ते) = आपके (अस्य) = इस (नव्यसः) = अतिशयेन स्तुत्य धन को विद्याम प्राप्त करें [विद् लाभे] अथवा जानें। अर्थात् हमें धन प्राप्त हो और हम धन का उत्तम ही विनियोग करें। [२] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो ! हम आपके (स्पार्हस्य) = स्पृहणीय (राधसः) = कार्यसाधक (वसोः) = धन का [रिद्याम] लाभ प्राप्त करें [विद् लाभे] । अर्थात् हमें स्पृहणीय कार्यसाधक धन प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के अनुग्रह से हमें 'स्तुत्य स्पृहणीय कार्यसाधक' धन प्राप्त हो।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदेव वस्तु दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वृत्रहन् ! हे शूर ! हे पुरुहूत=बहुहूत=बहुपूजित इन्द्र ! ते=तव। नव्यसः=नूतनस्य। स्पार्हस्य=स्पृहणीयस्य। राधसः=शर्मादेः संसाधकस्य। “राध साध संसिद्धौ”। वसोः=धनस्य। सर्वत्रात्र कर्मणि षष्ठी। विद्याम=लभेमहि ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O destroyer of evil and darkness, bold and resolute hero universally invoked and adored, pray let us know and obtain the latest, most lovable and effective forms of your wealth and honour, peace and progressive modes of life.