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विश्वे॒ हि त्वा॑ स॒जोष॑सो दे॒वासो॑ दू॒तमक्र॑त । श्रु॒ष्टी दे॑व प्रथ॒मो य॒ज्ञियो॑ भुवः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśve hi tvā sajoṣaso devāso dūtam akrata | śruṣṭī deva prathamo yajñiyo bhuvaḥ ||

पद पाठ

विश्वे॑ । हि । त्वा॒ । स॒ऽजोष॑सः । दे॒वासः॑ । दू॒तम् । अक्र॑त । श्रु॒ष्टी । दे॒व॒ । प्र॒थ॒मः । य॒ज्ञियः॑ । भु॒वः॒ ॥ ८.२३.१८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:23» मन्त्र:18 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:12» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:18


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शिव शंकर शर्मा

उसकी प्रधानता दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! (विश्वे+देवासः) सकल ज्ञानीजन (सजोषसः) मिल-जुलकर (त्वा+हि+दूतम्+अक्रत) तुझको ही दूत बनाते हैं। अथवा तुझको ही अपना उपास्य देव मानते हैं। इसलिये हे देव ! तू (श्रुष्टी) स्तुतियों का श्रोता अथवा शीघ्र (प्रथमः+यज्ञियः+भुवः) सर्वश्रेष्ठ पूज्य हुआ है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - सकल विद्वान् प्रथम ईश्वर को ही पूजते हैं, अतः इतर जन भी उनका ही अनुकरण करें, यह शिक्षा इससे देते हैं ॥१८॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सजोषसः) परस्पर प्रेमभाव से वर्तमान (विश्वे, देवासः) सब राजा लोग (त्वा, हि, दूतम्, अक्रत) आप ही को आपत्तिनिवारक पद पर स्थापित करते हैं, इससे (देव) हे दिव्य तेजवाले ! (प्रथमः, यज्ञियः) सबसे प्रथम यज्ञ में उपस्थाता आप ही (श्रुष्टी) शीघ्र (भुवः) हों ॥१८॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में यह आदेश किया है कि जिस देश में सम्पूर्ण शासक लोग विद्वान् योद्धाओं को अपना संरक्षक बनाते हैं, वह देश शीघ्र ही उत्क्रान्ति को प्राप्त होता है ॥१८॥
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शिव शंकर शर्मा

तस्य प्राथम्यं दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ईश ! विश्वे+देवासः=सर्वे देवा ज्ञानिनो जनाः। सजोषसः=संगताः सन्तः। त्वा हि दूतम्। अक्रत=कुर्वन्ति। हे देव ! श्रुष्टी=श्रोता क्षिप्रं वा। प्रथमो यज्ञियः। भुवः=भवसि ॥१८॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सजोषसः, विश्वे, देवासः) सहजुषमाणाः सर्वे राजानः (त्वा, हि, दूतम्, अक्रत) त्वां हि दूतम्=अनर्थवारकम् अकृषत “दूतो जवतेर्वा द्रवतेर्वा वारयतेर्वा” नि० ५।२। अतः (देव) हे दिव्यतेजः ! (प्रथमः, यज्ञियः) आद्य एव यज्ञोपस्थाता (श्रुष्टी) क्षिप्रम् (भुवः) भूयाः ॥१८॥