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अ॒यं वा॒मद्रि॑भिः सु॒तः सोमो॑ नरा वृषण्वसू । आ या॑तं॒ सोम॑पीतये॒ पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ayaṁ vām adribhiḥ sutaḥ somo narā vṛṣaṇvasū | ā yātaṁ somapītaye pibataṁ dāśuṣo gṛhe ||

पद पाठ

अ॒यम् । वा॒म् । अद्रि॑ऽभिः । सु॒तः । सोमः॑ । न॒रा॒ । वृ॒ष॒ण्व॒सू॒ इति॑ वृषण्ऽवसू । आ । या॒त॒म् । सोम॑ऽपीतये । पिब॑तम् । दा॒शुषः॑ । गृ॒हे ॥ ८.२२.८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:22» मन्त्र:8 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:8


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शिव शंकर शर्मा

राजा आदरणीय है, यह इससे दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (नरा) हे सर्वनेता (वृषण्वसू) हे धनों के वर्षा करनेवाले राजन् तथा अमात्य ! (वाम्) आपके लिये (अयम्) यह (सोमः) सोमरस (अद्रिभिः) शिलाओं से (सुतः) पीसा हुआ है, अतः (सोमपीतये) सोम पीने के लिये (आयातम्) आवें और आकर (दाशुषः+गृहे) दानी या भक्त के गृह में (पिबतम्) सोम पीवें ॥८॥
भावार्थभाषाः - राजा और अमात्यगण सत्करणीय हैं, यह इसका भाव है ॥८॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषण्वसू) हे धनों की वर्षा करनेवाले (नरा) नेता ! (अद्रिभिः, सुतः) विदारण साधन शक्तियों से सिद्ध किया गया (अयम्, वाम्, सोमः) यह आपका सोमरस उपस्थित है, अतः (सोमपीतये) सोमपानार्थ (आयातम्) आवें (दाशुषः) आपकी सेवा में उत्पन्न याज्ञिक के (गृहे) गृह में (पिबतम्) पान करें ॥८॥
भावार्थभाषाः - हे सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के प्रदाता नेता पुरुषो ! हम याज्ञिक आपका सत्कार करते हैं। आप हमारे यज्ञसदन को प्राप्त होकर उपर्युक्त प्रकार से सिद्ध किये हुए सोमरस का पान कर हमें उत्साहित करें, ताकि हम अपने कर्म करने में सदा सन्नद्ध रहें ॥८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'वृषण्वसू' [प्राणापान]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (नरा) = हमें उन्नतिपथ पर ले चलनेवाले, (वृषण्वसू) = शक्ति रूप धनोंवाले प्राणापानो ! (अद्रिभिः) = उपासकों के द्वारा (वाम्) = आपके लिये (अयम्) = यह (सोमः) = सोम (सुतः) = उत्पन्न किया गया है। प्राणसाधना से सोम की शरीर में ऊर्ध्वगति होती है, और सुरक्षित सोम के द्वारा प्राणशक्ति का वर्धन होता है। [२] हे प्राणापानो! आप (सोमपीतये) = इस सोम के रक्षण के लिये (आयातम्) = आइये, आपने ही तो इस सोम की शरीर में ऊर्ध्वगति करनी है। (आपः दाशुषः) = दाश्वान् पुरुष के (गृहे) = घर में (पिबतम्) = इस सोम को पीनेवाले होइये । यह शरीर ही घर है। 'दाश्वान्' पुरुष वह है जिसका जीवन दानपूर्वक भोगवाला, अर्थात् यज्ञशील हो। यह पुरुष ही भोगवाद से ऊपर उठने के कारण सोम का रक्षण कर पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु की उपासना करते हुए प्राणसाधना में प्रवृत्त होंगे और दानशील बने रहेंगे, तो भोग वृत्ति से ऊपर उठने के कारण सोम का शरीर में रक्षण कर पायेंगे।
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शिव शंकर शर्मा

राजाऽऽदरणीय इति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे नरा=सर्वेषां नेतारौ ! वृषण्वसू=वृषणवसू=वसूनां वर्षितारौ राजानौ ! अयं सोमः। वाम्=युष्मदर्थम्। अद्रिभिः=शिलाभिः। सुतः=पिष्टोऽस्ति। अतः। सोमपीतये=सोमपानाय। आयातमागच्छतम्। आगत्य। दाशुषः=भक्तजनस्य। गृहे। पिबतं सोमम् ॥८॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषण्वसू) हे धनानां वर्षकौ (नरा) नेतारौ ! (अद्रिभिः, सुतः) विदारणसाधनैः सम्पादितः (अयम्, वाम्, सोमः) युवयोः सोमरसः सिद्धः (सोमपीतये, आयातम्) सोमपानाय आगच्छतम् (दाशुषः) रसस्य दातुः (गृहे) यज्ञसदने (पिबतम्) पानं कुरुतम् ॥८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O leading lights of humanity, generous harbingers of the showers of prosperity, this soma of pleasure and honour distilled with the complementary forces of our social dynamics is for you. Come to participate in the celebrations of the nation for the taste of glory and ecstasy and drink the soma in the yajnic house of the generous giver and performer of yajna.