उत्पू॒षणं॑ युवामहे॒ऽभीशूँ॑रिव॒ सार॑थिः। म॒ह्या इन्द्रं॑ स्व॒स्तये॑ ॥६॥
ut pūṣaṇaṁ yuvāmahe bhīśūm̐r iva sārathiḥ | mahyā indraṁ svastaye ||
उत्। पू॒षण॑म्। यु॒वा॒म॒हे॒। अ॒भीशू॑न्ऽइव। सार॑थिः। म॒ह्यै। इन्द्र॑म्। स्व॒स्तये॑ ॥६॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त होने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
मह्यौ स्वस्तये
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः किं प्राप्तव्यमित्याह ॥
हे मनुष्या ! यथा वयं मह्यै स्वस्तये सारथिरभीशूनिव पूषणमिन्द्रं चोद्युवामहे तथैव यूयमपि कुरुत ॥६॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
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