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गावो॒ भगो॒ गाव॒ इन्द्रो॑ मे अच्छा॒न् गावः॒ सोम॑स्य प्रथ॒मस्य॑ भ॒क्षः। इ॒मा या गावः॒ स ज॑नास॒ इन्द्र॑ इ॒च्छामीद्धृ॒दा मन॑सा चि॒दिन्द्र॑म् ॥५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

gāvo bhago gāva indro me acchān gāvaḥ somasya prathamasya bhakṣaḥ | imā yā gāvaḥ sa janāsa indra icchāmīd dhṛdā manasā cid indram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

गावः॑। भगः॑। गावः॑। इन्द्रः॑। मे॒। अ॒च्छा॒न्। गावः॑। सोम॑स्य। प्र॒थ॒मस्य॑। भ॒क्षः। इ॒माः। याः। गावः॑। सः। ज॒ना॒सः॒। इन्द्रः॑। इ॒च्छामि॑। इत्। हृ॒दा। मन॑सा। चि॒त्। इन्द्र॑म् ॥५॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:28» मन्त्र:5 | अष्टक:4» अध्याय:6» वर्ग:25» मन्त्र:5 | मण्डल:6» अनुवाक:3» मन्त्र:5


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य विद्या की इच्छा करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (जनासः) विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (प्रथमस्य) पहिले (सोमस्य) ऐश्वर्य की सेवनेवाली (गावः) गौएँ बछड़ों को दूध देती हैं, वैसे (गावः) किरणों के समान जन और (भगः) ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाला (गावः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों को और (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (भक्षः) सेवा करने योग्य जन (मे) मेरे लिये (अच्छान्) देवें और (याः) जो (इमाः) ये (गावः) वाणियाँ जिसकी हैं (सः) वह (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त मुझ को शिक्षा देवे और मैं (हृदा) आत्मा तथा (मनसा) विज्ञान से (चित्) भी (इन्द्रम्) ऐश्वर्ययुक्त जन की (इत्) ही (इच्छामि) इच्छा करता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य आत्मा और अन्तःकरण से विद्या की प्राप्ति की इच्छा करते हैं, वे सब सुख का भोग करते हैं ॥५॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

मनुष्यैरवश्यं विद्याप्राप्तीच्छा कार्य्येत्याह ॥

अन्वय:

हे जनासो विद्वांसो ! यथा प्रथमस्य सोमस्य सेवमाना गावो वत्सान् दुग्धं प्रयच्छन्ति तथा गावो जना भगो गाव इन्द्रो भक्षश्च मेऽच्छान् या इमा गावो यस्य सन्ति स इन्द्रो मां शिक्षतु। अहं हृदा मनसा चिदिन्द्रमिदिच्छामि ॥५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (गावः) किरणा इव (भगः) ऐश्वर्यमिच्छुः (गावः) सुशिक्षिता वाचः (इन्द्रः) विद्यैश्वर्ययुक्तः (मे) मम (अच्छान्) यच्छन्तु प्रददतु। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेति यलोपः। (गावः) धेनवः (सोमस्य) ऐश्वर्यस्य (प्रथमस्य) आदिमस्य (भक्षः) सेवनीयः (इमाः) (याः) (गावः) वाचः (सः) (जनासः) विद्वांसः (इन्द्रः) (इच्छामि) (इत्) एव (हृदा) आत्मना (मनसा) विज्ञानेन (चित्) अपि (इन्द्रम्) ॥५॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः । ये मनुष्या आत्मनाऽन्तःकरणेन च विद्यां प्राप्तुमिच्छन्ति ते सर्वं सुखमश्नुवते ॥५॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जी माणसे आत्मा व अंतःकरणपूर्वक विद्याप्राप्तीची इच्छा करतात ती सर्व सुखे भोगतात. ॥ ५ ॥