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प्र वो॑ म॒हे म॒तयो॑ यन्तु॒ विष्ण॑वे म॒रुत्व॑ते गिरि॒जा ए॑व॒याम॑रुत्। प्र शर्धा॑य॒ प्रय॑ज्यवे सुखा॒दये॑ त॒वसे॑ भ॒न्ददि॑ष्टये॒ धुनि॑व्रताय॒ शव॑से ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra vo mahe matayo yantu viṣṇave marutvate girijā evayāmarut | pra śardhāya prayajyave sukhādaye tavase bhandadiṣṭaye dhunivratāya śavase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र। वः॒। म॒हे। म॒तयः॑। य॒न्तु॒। विष्ण॑वे। म॒रुत्व॑ते। गि॒रि॒ऽजाः। ए॒व॒या॒म॑रुत्। प्र। शर्धा॑य। प्रऽय॑ज्यवे। सु॒ऽखा॒दये॑। त॒वसे॑। भ॒न्दत्ऽइ॑ष्टये। धुनि॑ऽव्रताय। शव॑से ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:87» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:4» वर्ग:33» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:6» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब नव ऋचावाले सत्तासीवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को कैसे क्या प्राप्त होता है, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! जैसे (मरुत्वते) प्रशंसित मनुष्य जिसमें उस (महे) बड़े (विष्णवे) व्यापक बिजुलीरूप अग्नि के लिये (गिरिजाः) मेघ में उत्पन्न हुए प्राप्त होते हैं, वैसे (वः) आप लोगों को (मतयः) मनुष्य वा बुद्धियाँ (प्र, यन्तु) प्राप्त होवें और जैसे (एवयामरुत्) प्राप्त करानेवालों को प्राप्त होनेवालों का मनुष्य (शर्धाय) बल के और (प्रयज्यवे) अत्यन्त यजन करते हैं जिससे उस (सुखादये) उत्तम प्रकार खानेवाले (तवसे) बलिष्ठ के लिये तथा (भन्ददिष्टये) कल्याण और सुख की संगति के लिये (धुनिव्रताय) और कंपित व्रत जिसका उस (शवसे) बल के लिये (प्र) समर्थ होता है, वैसे आप लोग भी इसके लिये समर्थ हूजिये ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे बिजुलीरूप अग्नि को मेघोत्पन्न गर्जनादि प्रभाव प्राप्त होते हैं, क्योंकि वे गर्जनादि प्रभाव अग्नि और वायु से सिद्ध होने योग्य हैं, वैसे बुद्धिमान् पुरुषों को अन्य पुरुष प्राप्त होते हैं। और गुण प्राप्त करानेवाला पुरुष गुणी पुरुष को ढूँढता है और अति उत्तम बल को भी प्राप्त होता है ॥१॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ मनुष्यान् कथं किं प्राप्नोतीत्याह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यथा मरुत्वते महे विष्णवे विद्युद्रूपाग्नये गिरिजा यन्ति तथा वो मतयः प्र यन्तु यथैवयामरुच्छर्धाय प्रयज्यवे सुखादये तवसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताय शवसे प्र भवति तथा यूयमप्येतस्मै प्र भवत ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (प्र) (वः) युष्मान् (महे) महते (मतयः) मनुष्या बुद्धयो वा (यन्तु) प्राप्नुवन्तु (विष्णवे) व्यापकाय (मरुत्वते) प्रशंसिता मनुष्या यस्मिँस्तस्मै (गिरिजाः) ये गिरौ मेघे जाताः (एवयामरुत्) य एवान् प्रापकान् यान्ति तेषां यो मरुन्मनुष्यः (प्र) (शर्धाय) बलाय (प्रयज्यवे) प्रयजन्ति येन तस्मै (सुखादये) यस्सुष्ठु खादति तस्मै (तवसे) बलिष्ठाय (भन्ददिष्टये) कल्याणसुखसङ्गतये (धुनिव्रताय) धुनानि कम्पितानि व्रतानि यस्य तस्मै (शवसे) बलाय ॥१॥
भावार्थभाषाः - यथा विद्युद्रूपाग्निं मेघोत्पन्ना गर्जनादिप्रभावा गच्छन्ति यतोऽग्नीवायुसाध्यास्ते तथा धीमतः पुरुषानन्ये सम्प्राप्नुवन्ति गुणप्रापको गुणिनमन्विच्छत्यत्युत्तमं बलं चाप्नोति ॥१॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात वायू, विद्वान व परमेश्वराच्या उपासनेचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - जसे विद्युतरूपी अग्नीवर मेघांनी उत्पन्न झालेल्या गर्जनेचा प्रभाव असतो व गर्जना इत्यादी प्रभाव अग्नी व वायूने सिद्ध होण्यायोग्य असतात तसे बुद्धिमान पुरुषांना इतर पुरुष भेटतात व गुणप्रापक पुरुष गुणी पुरुषाला शोधतो व अति उत्तम बलही प्राप्त होते. ॥ १ ॥