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अग्ने॒ सह॑न्त॒मा भ॑र द्यु॒म्नस्य॑ प्रा॒सहा॑ र॒यिम्। विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भ्या॒३॒॑सा वाजे॑षु सा॒सह॑त् ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne sahantam ā bhara dyumnasya prāsahā rayim | viśvā yaś carṣaṇīr abhy āsā vājeṣu sāsahat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑। सह॑न्तम्। आ। भ॒र॒। द्यु॒म्नस्य॑। प्र॒ऽसहा॑। र॒यिम्। विश्वाः॑। यः। च॒र्ष॒णीः। अ॒भि। आ॒सा। वाजे॑षु। स॒सह॑त् ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:23» मन्त्र:1 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब चार ऋचावाले तेईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य वीर के गुणों का उपदेश करते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (अग्ने) वीरपुरुष ! (यः) जो (विश्वाः) सम्पूर्ण (प्रासहा) अत्यन्त शत्रुओं के बलों को सहनेवाली (चर्षणीः) पराक्रम से प्रकाशमान मनुष्यों की सेनाओं को (वाजेषु) संग्रामों में (सासहत्) अत्यन्त सहे और (आसा) मुख से (अभि) सब प्रकार से उपदेश देवे, उस शत्रुओं के बल को (सहन्तम्) सहते हुए (द्युम्नस्य) धन वा यश के सम्बन्ध में (रयिम्) धन को आप (आ, भर) सब प्रकार धारण करो ॥१॥
भावार्थभाषाः - जिसकी विजय की इच्छा होवे, यह शूरवीरों की सेना उत्तम प्रकार शिक्षा की गई रक्खे और वीररस के उपदेश से उत्साह दिलाकर शत्रुओं के साथ लड़ावे ॥१॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निपदवाच्यवीरगुणानाह ॥

अन्वय:

हे अग्ने वीर ! यो विश्वाः प्रासहा चर्षणीर्वाजेषु सासहदासाभ्युपदिशेत्तं शत्रुबलं सहन्तं द्युम्नस्य रयिं त्वमा भर ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) वीरपुरुष (सहन्तम्) (आ) (भर) (द्युम्नस्य) धनस्य यशसो वा (प्रासहा) याः प्रकर्षेण शत्रुबलानि सहन्ते ताः सेनाः। अत्रान्येषामपीत्याद्यचो दीर्घः। (रयिम्) धनम् (विश्वाः) अखिलाः (यः) (चर्षणीः) प्रकाशमाना मनुष्यसेनाः (अभि) (आसा) आस्येन (वाजेषु) संग्रामेषु (सासहत्) भृशं सहेत। अत्र तुजादीनामित्यभ्यासदैर्घ्यम् ॥१॥
भावार्थभाषाः - यस्य विजयेच्छा स्यात् स शूरवीरसेनां सुशिक्षितां रक्षेत् वीररसोपदेशेनोत्साह्य शत्रुभिः सह योधयेत् ॥१॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अग्नीच्या गुणांचे वर्णन असल्याप्रमाणे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - ज्याला विजय प्राप्त करण्याची इच्छा असेल त्याने उत्तम प्रकारे प्रशिक्षित सेना बाळगावी व वीररसाच्या उपदेशाने उत्साहित करून शत्रूंबरोबर युद्ध करवावे. ॥ १ ॥