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उषो॑ मघो॒न्या व॑ह॒ सूनृ॑ते॒ वार्या॑ पु॒रु। अ॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति ॥९॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uṣo maghony ā vaha sūnṛte vāryā puru | asmabhyaṁ vājinīvati ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उषः॑। म॒घो॒नि॒। आ। व॒ह। सूनृ॑ते। वार्या॑। पु॒रु। अ॒स्मभ्य॑म्। वा॒जि॒नी॒ऽव॒ति ॥९॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:55» मन्त्र:9 | अष्टक:3» अध्याय:8» वर्ग:7» मन्त्र:4 | मण्डल:4» अनुवाक:5» मन्त्र:9


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (उषः) प्रातःकाल के सदृश वर्त्तमान (सूनृते) सत्यवाणीयुक्त (मघोनि) प्रशंसित धन को करनेवाली (वाजिनीवति) उत्तम विद्या से युक्त पत्नी ! तू (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (पुरु) बहुत (वार्या) वर्त्ताव में लाने योग्य वस्तुओं को (आ, वह) सब प्रकार से प्राप्त कराओ ॥९॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभातवेला सब जीवों की प्रिय करनेवाली है, वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री सब को प्रिय होती है ॥९॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे उषर्वद्वर्त्तमाने सूनृते मघोनि वाजिनीवति ! पत्नी त्वमस्मभ्यं पुरु वार्याऽऽवह ॥९॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उषः) उषर्वद्वर्त्तमाने (मघोनि) प्रशंसितधनकारिके (आ) (वह) समन्तात् प्रापय (सूनृते) सत्यवाक् (वार्या) वर्त्तुमर्हाणि वस्तूनि (पुरु) (अस्मभ्यम्) (वाजिनीवति) उत्तमविद्यायुक्ते ॥९॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथोषाः सर्वजीवानां प्रियकारिणी वर्त्तते तथैव विदुषी स्त्री सर्वप्रिया जायते ॥९॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. जशी उषा सर्व जीवांना प्रिय असते तशीच विद्यायुक्त स्त्री सर्वांना प्रिय असते. ॥ ९ ॥