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हं॒सासो॒ ये वां॒ मधु॑मन्तो अ॒स्रिधो॒ हिर॑ण्यपर्णा उ॒हुव॑ उष॒र्बुधः॑। उ॒द॒प्रुतो॑ म॒न्दिनो॑ मन्दिनि॒स्पृशो॒ मध्वो॒ न मक्षः॒ सव॑नानि गच्छथः ॥४॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

haṁsāso ye vām madhumanto asridho hiraṇyaparṇā uhuva uṣarbudhaḥ | udapruto mandino mandinispṛśo madhvo na makṣaḥ savanāni gacchathaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हं॒सासः॑। ये। वा॒म्। मधु॑ऽमन्तः। अ॒स्रिधः॑। हिर॑ण्यऽपर्णाः। उ॒हुवः॑। उ॒षः॒ऽबुधः॑। उ॒द॒ऽप्रुतः॑। म॒न्दिनः॑। म॒न्दि॒ऽनि॒स्पृशः॑। मध्वः॑। न। मक्षः॑। सव॑नानि। ग॒च्छ॒थः॒ ॥४॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:45» मन्त्र:4 | अष्टक:3» अध्याय:7» वर्ग:21» मन्त्र:4 | मण्डल:4» अनुवाक:4» मन्त्र:4


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे राजा और सेना के ईश जन ! (वाम्) आप दोनों के (ये) जो (मधुमन्तः) मधुर गमन से युक्त (अस्रिधः) नहीं मारे गये (हिरण्यपर्णाः) तेजमय वा सुवर्ण आदि से बने हुए पंख जिनके (उषर्बुधः) जो प्रातःकाल में बोध से युक्त (उहुवः) भारों के ले चलने (उदप्रुतः) जल के चलाने (मन्दिनः) आनन्द के देने और (मन्दिनिस्पृशः) आनन्द के स्पर्श करानेवाले (मध्वः) मधुर पदार्थ के सम्बन्ध में (मक्षः) मक्षियों के राजा के (न) सदृश (हंसासः) तथा हंस के सदृश शीघ्र चलनेवाले घोड़े हैं, उनसे (सवनानि) ऐश्वर्य्यों को आप दोनों (गच्छथः) प्राप्त होते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे राजपुरुषो ! आप लोग वाहनों की कलों में अग्निजलादि के संप्रयोग से शीघ्र आ आकर ऐश्वर्य्य की इच्छा करें तो क्या रत्न को न प्राप्त होवें ॥४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कैसे इन्द्रियाश्व ?

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अश्विनौ) = प्राणापानो ! (ये) = जो (वाम्) = आपके (उहुव:) = वहन करनेवाले अश्व हैं, वे हमारे (सवनानि) = जीवनयज्ञ के प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन तथा सायन्तनसवनों में (गच्छथः) प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार प्राप्त होते हैं, (न) = जैसे कि (मक्षः) = मक्खियाँ (मध्वः) = शहद के छत्ते को प्राप्त होती हैं । [२] यहाँ इन्द्रियाँ ही अश्व हैं। ये प्राणापान के इसलिए कहलाते हैं कि प्राणशक्ति ही तो इनमें काम करती है। ये इन्द्रियाश्व (हंसास:) = [हन् हिंसागत्योः] गतिशीलता द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाले हैं। अपने-अपने कर्म में लगे रहने से ये विषयों में फँसती नहीं। (मधुमन्तः) = स्वस्थ इन्द्रियाँ जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाली हैं। (अस्त्रिध:) = हमारा द्रोह व हिंसन करनेवाली नहीं। (हिरण्यपर्णा) = वीर्य व ज्ञान द्वारा ये हमारा पालन व पूरण करनेवाली हैं। वीर्य द्वारा पालन और ज्ञान द्वारा पूरण। [हिरण्यं वै वीर्यम्, हिरण्यं वै ज्योतिः] । (उषर्बुधः) = ये उषाकाल में ही प्रबुद्ध होनेवाली हैं। [२] ये इन्द्रियरूप अश्व (उदप्रुतः) = वीर्यरूप जल से अपने को सिक्त करनेवाले हैं। (मन्दिनः) = अत्यन्त प्रसन्नतावाले हैं और (मन्दिनिस्पृशः) = उस आनन्दमय प्रभु में स्पर्श करनेवाले हैं। सोमरक्षण से कर्मेन्द्रियाँ सशक्त बनती हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ दीप्त होती हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से इन्द्रियाश्व निष्पाप बनकर [हंस] अन्ततः प्रभु को प्राप्त करानेवाले होते हैं [मन्दिनिस्पृशः] ।
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह ॥

अन्वय:

हे राजसेनेशौ ! वां ये मधुमन्तोऽस्रिधो हिरण्यपर्णा उषर्बुध उहुव उदप्रुतो मन्दिनः मन्दिनिस्पृशो मध्वो मक्षो न हंसासः सन्ति तैः सवनानि युवां गच्छथः ॥४॥

पदार्थान्वयभाषाः - (हंसासः) हंस इव सद्यो गन्तारोऽश्वाः। हंसास इत्यश्वनामसु पठितम्। (निघं०१.१४) (ये) (वाम्) युवयोः (मधुमन्तः) मधुगत्योपेताः (अस्रिधः) अहिंसिताः (हिरण्यपर्णाः) हिरण्यानि पर्णाः पक्षा येषान्ते (उहुवः) भाराणां वोढारः (उषर्बुधः) उषसि बोधयुक्ताः (उदप्रुतः) उदकस्य गमयितारः (मन्दिनः) आनन्दयितारः (मन्दिनिस्पृशः) आनन्दस्य स्पर्शयितारः (मध्वः) मधुनः (न) इव (मक्षः) मक्षिराजः (सवनानि) ऐश्वर्याणि (गच्छथः) ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे राजपुरुषा ! भवन्तो यानयन्त्रेष्वग्निजलादिसम्प्रयोगात् सद्योगत्वाऽऽगत्यैश्वर्य्यं चिकीर्षेयुस्तर्हि किं रत्नं नोपलभेरन् ॥४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Flying gracefully like hansa birds, pleasant and agreeable, fleet and comfortable, golden winged morning birds floating across mists and waters, giving the luxurious feel of breezy ecstasy: such are your horses which transport you across the spaces like bees flying to the honey cups of flowers, by which you proceed to the yajnic programmes of humanity creating the honour and excellence of life.
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आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

More about the solar energy is told.

अन्वय:

O king and Commander-in-chief of the army come to our places of prosperity with your swan-like horses ! which have sweet ( charming ) movements, and are inviolable. They are golden winged, wakers at dawn, bearers of burden, dispensers of water and are gladdening. Come to us as the bees are set upon the collection of honey.

भावार्थभाषाः - O kings and officers of the State ! you go to distant places and come by applying various machines in your vehicles, and move by the proper combination of fire, water and other substances. And thereby you desire to achieve prosperity. This is the way that you may be able to get any jewel.
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - हे राजपुरुषांनो ! तुम्ही यानाच्या यंत्रामध्ये अग्नी व जल यांच्या संप्रयोगाने तात्काळ जा ये करून ऐश्वर्याची इच्छा केल्यास रत्ने का प्राप्त होणार नाहीत? ॥ ४ ॥