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प्रत्य॒ग्निरु॒षसो॑ जा॒तवे॑दा॒ अख्य॑द्दे॒वो रोच॑माना॒ महो॑भिः। आ ना॑सत्योरुगा॒या रथे॑ने॒मं य॒ज्ञमुप॑ नो यात॒मच्छ॑ ॥१॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

praty agnir uṣaso jātavedā akhyad devo rocamānā mahobhiḥ | ā nāsatyorugāyā rathenemaṁ yajñam upa no yātam accha ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्रति॑। अ॒ग्निः। उ॒षसः॑। जा॒तऽवे॑दाः। अख्य॑त्। दे॒वः। रोच॑मानाः। महः॑ऽभिः। आ। ना॒स॒त्या॒। उ॒रु॒ऽगा॒या। रथे॑न। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। उप॑। नः॒। या॒त॒म्। अच्छ॑ ॥१॥

ऋग्वेद » मण्डल:4» सूक्त:14» मन्त्र:1 | अष्टक:3» अध्याय:5» वर्ग:14» मन्त्र:1 | मण्डल:4» अनुवाक:2» मन्त्र:1


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब पाँच ऋचावाले चौदहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निसादृश्य से विद्वानों के गुणों का उपदेश करते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (नासत्या) असत्य आचरण से रहित (उरुगाया) बहुत प्रशंसावाले अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप दोनों (महोभिः) बड़ों के साथ (रथेन) वाहन से (नः) हम लोगों के प्रकाश्य और प्रकाशस्वरूप व्यवहार और (इमम्) इस वर्त्तमान (यज्ञम्) यज्ञ को (जातवेदाः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (देवः) प्रकाशमान (अग्निः) बिजुली के सदृश अग्नि (रोचमानाः) प्रकाशमान (उषसः) दिन के मुख अर्थात् प्रारम्भ के (प्रति) प्रति (अख्यत्) प्रकाशित होता है, वैसे (अच्छ) उत्तम प्रकार (उप) समीप (आ, यातम्) आओ प्राप्त होओ ॥१॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो जैसे सूर्य्य प्रातःकाल से शोभित होता है, वैसे ही सत्य के उपदेश से रथ से मार्ग के सदृश विद्या के सुख को प्राप्त कराते हैं, वे इस संसार में कल्याणकारक होते हैं ॥१॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निसादृश्येन विद्वद्गुणानाह ॥

अन्वय:

हे नासत्योरुगायाध्यापकोपदेशकौ ! युवां महोभी रथेन न इमं यज्ञं जातवेदा देवोऽग्नी रोचमाना उषसः प्रत्यख्यद् दिवाऽच्छोपायातम् ॥१॥

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रति) (अग्निः) विद्युदिव (उषसः) दिवसमुखस्य (जातवेदाः) उत्पन्नेषु विद्यमानः (अख्यत्) प्रकाशते (देवः) देदीप्यमानः (रोचमानाः) प्रकाशमानाः (महोभिः) महद्भिः (आ) (नासत्या) अविद्यमानसत्याचरणौ (उरुगाया) बहुप्रशंसौ (रथेन) यानेन (इमम्) वर्त्तमानं (यज्ञम्) (उप) (नः) अस्माकम् [(यज्ञम्)] प्रकाश्यप्रकाशकमयं व्यवहारम् (यातम्) प्राप्नुतम् (अच्छ) ॥१॥
भावार्थभाषाः - अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या ! ये यथा सूर्य्य उषसो विभाति तथैव सत्येनोपदेशेन रथेन मार्गमिव विद्यां सुखं प्रापयन्ति तेऽत्र जगति कल्याणकरा भवन्ति ॥१॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात अग्नी, विद्वान, स्त्री, पुरुष यांच्या कृत्याचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्व सूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - या मंत्रात वाचकलुप्तोपमालंकार आहे. सूर्य जसा उषःकाली शोभून दिसतो, तसे हे माणसांनो ! सत्याच्या उपदेशाने रथाच्या मार्गाप्रमाणे जे विद्येचे सुख प्राप्त करवितात ते जगाचे कल्याणकर्ते असतात. ॥ १ ॥