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ध॒र्तारो॑ दि॒व ऋ॒भव॑: सु॒हस्ता॑ वातापर्ज॒न्या म॑हि॒षस्य॑ तन्य॒तोः । आप॒ ओष॑धी॒: प्र ति॑रन्तु नो॒ गिरो॒ भगो॑ रा॒तिर्वा॒जिनो॑ यन्तु मे॒ हव॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dhartāro diva ṛbhavaḥ suhastā vātāparjanyā mahiṣasya tanyatoḥ | āpa oṣadhīḥ pra tirantu no giro bhago rātir vājino yantu me havam ||

पद पाठ

ध॒र्तारः॑ । दि॒वः । ऋ॒भवः॑ । सु॒ऽहस्ताः॑ । वा॒ता॒प॒र्ज॒न्या । म॒हि॒षस्य॑ । त॒न्य॒तोः । आपः॑ । ओष॑धीः । प्र । ति॒र॒न्तु॒ । नः॒ । गिरः॒ । भगः॑ । रा॒तिः । वा॒जिनः॑ । य॒न्तु॒ । मे॒ । हव॑म् ॥ १०.६६.१०

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:66» मन्त्र:10 | अष्टक:8» अध्याय:2» वर्ग:13» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:5» मन्त्र:10


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (महिषस्य तन्यतोः) महान् प्रकाश के विस्तार करनेवाले परमात्मा या सूर्य का (दिवः-धर्तारः) द्युलोक-प्रकाश के धारक (सुहस्ताः-ऋभवः) उत्तम हाथवाले शिल्पियों की भाँति किरणें और (वातापर्जन्या) शोभन हस्तक्रियावाले शिल्पियों की भाँति वायु और मेघ (ओषधीः-प्रतिरन्तु) ओषधिकों को बढ़ाते हैं (नः गिरः) हमारी वाणियों के प्रति (भगः-रातिः) भजनीय परमात्मा सुखदाता (वाजिनः) ज्ञानवान् विद्वान् और ऋत्विज (मे हवं हन्तु) मेरी प्रार्थना को पूरा करें ॥१०॥
भावार्थभाषाः - महान् ज्ञानप्रकाशवाले परमात्मा की ज्ञानरश्मियाँ तथा सूर्य की प्रकाशरश्मियाँ एवं वायु और मेघ शिल्पियों की भाँति ओषधियों के सम्पादन में समर्थ हैं तथा ज्ञानी जन हमारी प्रार्थना को सुनते हैं-स्वीकार करते हैं ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान- सत्य-कर्म

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (दिवः धर्तारः) = ज्ञान के धारण करनेवाले, मस्तिष्क को ज्ञानोज्ज्वल बनानेवाले, (ऋभवः) [ऋतेन भान्ति] = सत्य से हृदयों को सुशोभित करनेवाले तथा सुहस्ताः - हाथों से सदा कुशलतापूर्वक उत्तम कर्मों को करनेवाले व्यक्ति मे मेरे लिये (महिषस्य तन्यतो:) = महनीय गर्जना के अथवा उस- उस महनीय प्रभु की गर्जना के (वातापर्जन्या) = वायु व बादल हों। वायु उन बादलों को हमारे तक प्राप्त कराती है जो बादल कि गर्जना करनेवाले होते हैं। इसी प्रकार प्रभु गर्जना करते हैं ['तिस्रो वाच उदीरते हरिरेति कनिक्रदत्'] और ये लोग उस गर्जना को सुन सकने के लिये प्रभु को हमारे समीप प्राप्त कराते हैं। ये स्वयं प्रभु की गर्जना को सुनते हैं और हमें सुनने के योग्य बनाते हैं। प्रभु की गर्जना के 'तिस्रो वाचः ' तीन ही शब्द हैं- 'ज्ञान, कर्म व उपासना'। ये इन तीनों को अपने में धारण किये हुए हैं, 'दिवो धर्तारः 'ज्ञान, 'ऋभवः 'सत्य के द्वारा प्रभु का उपासन, 'सुहस्ता: 'कर्म। [२] (आपः ओषधीः) = जल व ओषधियाँ (नः) = हमारे लिये (गिरः) = इन ज्ञानवाणियों को (प्रतिरन्तु) = बढ़ानेवाले हों । अर्थात् सात्त्विक खान-पान के कारण हमारी बुद्धि भी सात्त्विक हो और हम उन ज्ञानवाणियों को समझने के योग्य हों। [२] ऐसा होने पर (भगः) = ऐश्वर्य की देवता (मे हवम्) = मेरी पुकार के (प्रति यन्तु) = आयें, अर्थात् मैं ऐश्वर्यशालीन बनूँ । (एतिः) = दान मेरी पुकार के प्रति आये। मैं उस धन का दान करनेवाला बनूँ । (वाजिनः) = शक्तिशाली देवता 'अग्नि, वायु वा सूर्य' [ तै० ब्रा० १ । ६ । ३] मेरी पुकार के प्रति आयें। मैं अग्नि के समान सब मलों का दग्ध करनेवाला, वायु के समान सतत क्रियाशील व सूर्य के समान प्रकाश को फैलानेवाला बनूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानपूर्ण मस्तिष्कवाले, सत्य से निर्मल मनवाले व हाथों से कुशलता से कर्मों को करनेवाले बनें ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (महिषस्य तन्यतोः) महतः “महिषो महन्नाम” [निघ० ३।३] प्रकाशस्य विस्तारयितुः परमात्मनः सूर्यस्य वा (दिवः-धर्तारः) द्युलोकस्य-प्रकाशस्य धारकाः (सुहस्ताः-ऋभवः) सुहस्ताः शिल्पिन इव रश्मयः ‘लुप्तोपमावाचकालङ्कारः’ “यदि कर्तं पतित्वा संश्रयेयद्वाऽश्मा प्रहतो जघान। त्रभूरथस्येवाङ्गानि सन्दधत्परुषापरुः” [अथर्व० ४।१२।७] (वातापर्जन्या) वातमेघौ (ओषधीः प्रतिरन्तु) ओषधीः प्रवर्धयन्ति ‘लडर्थे लोट्’ (नः-गिरः) अस्माकं वाचः प्रति (भगः-रातिः) भजनीयः परमात्मा सुखदाता च (वाजिनः) ज्ञानवन्तो विद्वांसः-ऋत्विजश्च (मे हवं यन्तु) प्रार्थनां प्राप्नुवन्तु पूरयन्तु ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the divine powers, sustainers of bright heaven, roaring winds and thundering clouds, faultless perfect waves of light and Rbhus, formative intelligence of nature and expert humanity, waters, herbs and trees listen, enjoy and augment our mantric voice, and may Bhaga, abundant spirit of highest grace, Rati, mother nature’s generosity, and the Vajins, fire, wind and sun, life energies of the three regions, listen to my invocation and join our yajna with abundance of gifts and teeming joy-