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आ तू षि॑ञ्च॒ हरि॑मीं॒ द्रोरु॒पस्थे॒ वाशी॑भिस्तक्षताश्म॒न्मयी॑भिः । परि॑ ष्वजध्वं॒ दश॑ क॒क्ष्या॑भिरु॒भे धुरौ॒ प्रति॒ वह्निं॑ युनक्त ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tū ṣiñca harim īṁ dror upasthe vāśībhis takṣatāśmanmayībhiḥ | pari ṣvajadhvaṁ daśa kakṣyābhir ubhe dhurau prati vahniṁ yunakta ||

पद पाठ

आ । तु । सि॒ञ्च॒ । हरि॑म् । ई॒म् । द्रोः । उ॒पऽस्थे॑ । वाशी॑भिः । त॒क्ष॒त॒ । अ॒श्म॒न्ऽमयी॑भिः । परि॑ । स्व॒ज॒ध्व॒म् । दश॑ । क॒क्ष्या॑भिः । उ॒भे इति॑ । धुरौ॑ । प्रति॑ । वह्नि॑म् । यु॒न॒क्त॒ ॥ १०.१०१.१०

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:101» मन्त्र:10 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:10


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (द्रोः) जिसमें प्राण रक्तधाराएँ-द्रवण करते हैं-बहते हैं, ऐसे वृक्षरूप देह के (उपस्थे) हृदयप्रदेश में (हरिम्) ताप हरनेवाले परमात्मा को उसके आनन्दरस को (तु-ईम्) हाँ फिर (आ षिञ्च) भलीभाँति सिञ्चन कर (अश्मन्मयीभिः) व्यापनशील (वाशीभिः) स्तुतिवाणियों से (तक्षत) स्तुति करो-साक्षात् करो तथा (दश कक्ष्याभिः) दश रज्जुबन्धनियों अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियों, वाणी, मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार से (वह्निम्) सबके बोढा़-वहन करनेवाले परमात्मा को (धुरौ प्रति-युनक्त) धारणीय संसार और मोक्ष के प्रति संयुक्त करो, (परि स्वजध्वम्) उसे परिपूर्णरूप से आलिङ्गित करो ॥१०॥
भावार्थभाषाः - प्राण रक्तधाराओं के बहने के स्थान शरीर में हृदय के अन्दर तापहारक परमात्मा के आनन्दरस को सींचना चाहिये तथा स्तुतिवाणियों द्वारा उसका साक्षात् करना चाहिये। पाँच ज्ञानेन्द्रियों, वाणी, और अन्तःकरण-चतुष्टय द्वारा सबको वहन करनेवाले परमात्मा को संसार और मोक्ष में आश्रित करे ॥१०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दश व्रत बन्धनरूप रज्जुएँ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] सब दुःखों के हरण करने के कारण प्रभु 'हरि' कहलाते हैं । (हरिम्) = दुःखहर्ता प्रभु को (तु) = निश्चय से (आसिञ्च) = अपने में सिक्त करने का प्रयत्न कर। (ईम्) = निश्चय से (अश्मन्मयीभिः) = [अश् व्याप्तौ ] उस सर्वव्यापक प्रभु के प्राचुर्यवाली (वाशीभिः) = वाणियों से (द्रोः उपस्थे) = इस गतिशील मन के मध्य में तक्षत उस प्रभु की भावना को निर्मित करो, अर्थात् हृदय में प्रभु का ही चिन्तन करो । चित्तवृत्ति का निरोध करके प्रभु का चिन्तन करने का प्रयत्न करो। [२] (दश कक्ष्याभिः) = दस संख्यावाली रज्जुओं से, अर्थात् दस इन्द्रियों से सम्बद्ध दस व्रतरूप बन्धनों से (परिष्वजध्वम्) = प्रभु का आलिंगन करनेवाले बनो। (उभे धुरौ) = दोनों ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्वों को (वह्निं प्रति) = उस संसार शकट के वहन करनेवाले प्रभु के प्रति युनक्त युक्त करो। सब इन्द्रियाँ अपने व्यवहारों से तुम्हें प्रभु के समीप ले जानेवाली हों । इन्द्रिय रूप अश्व व्रतबन्धन रूप रज्जुओं से बद्ध होने पर प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर ही चलते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हृदय में हम प्रभु का स्मरण करें। मन में ज्ञान की वाणियों को स्थापित करने का प्रयत्न करें । इन्द्रियों को व्रतबन्धन में बाँधकर प्रभु से आलिंगन करनेवाले हों ।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (द्रोः) यस्मिन् द्रवन्ति प्राणा रक्तधाराश्च स द्रुर्देहः “ऊर्ध्व-मूलोऽवाक्शाखः” [कठो०] तस्य (उपस्थे) हृदयप्रदेशे (हरिम्) तापहरं परमात्मानं तदानन्दरसं (तु-ईम्) पदपूरणौ (आ सिञ्च) समन्तात् सिञ्च (अश्मन्मयीभिः-वाशीभिः) व्यापनशीलाभिर्वाग्भिः-स्तुतिभिः (तक्षत) स्तुवीध्वं (दश-कक्ष्याभिः) दशभिः-रज्जुभिर्बन्धनीभिः-पञ्च ज्ञानेन्द्रियैर्वागिन्द्रियेण मनोबुद्धिचित्ताहङ्कारैश्च (वह्निम्) सर्ववोढारं परमात्मानं (धुरौ प्रति युनक्त) धारणीयौ संसारमोक्षौ प्रति संयोजयत (परि स्वजध्वम्) तं परिपूर्णरूपेणालिङ्गयत ॥१०॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O yajaka, pour inspiring soma into the cask, fill it to the brim, refine the cask with chiselled strokes of adamantine will, season the soma and secure the cask with ten sensitive fingers, and yoke the horse to the two suspension poles of the chariot.