इन्द्रेहि॒ मत्स्यन्ध॑सो॒ विश्वे॑भिः सोम॒पर्व॑भिः। म॒हाँ अ॑भि॒ष्टिरोज॑सा॥
indrehi matsy andhaso viśvebhiḥ somaparvabhiḥ | mahām̐ abhiṣṭir ojasā ||
इन्द्र॑। आ। इ॒हि॒। मत्सि॑। अन्ध॑सः। विश्वे॑भिः। सो॒म॒पर्व॑ऽभिः। म॒हान्। अ॒भि॒ष्टिः। ओज॑सा॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब नवम सूक्त के आरम्भ के मन्त्र में इन्द्र शब्द से परमेश्वर और सूर्य्य का प्रकाश किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
ओजसा अभिष्टिः
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्रेन्द्रशब्देनोभावर्थावुपदिश्येते।
यथाऽयमिन्द्रः सूर्य्यलोक ओजसा महानभिष्टिर्विश्वेभिः सोमपर्वभिः सहान्धसोऽन्नानां पृथिव्यादीनां प्रकाशेनेहि मत्सि हर्षहेतुर्भवति, तथैव हे इन्द्र त्वं महानभिष्टिर्विश्वेभिः सोमपर्वभिः सह वर्त्तमानः सन् ओजसोऽन्धस एहि प्रापयसि मत्सि हर्षयितासि॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Here by Indra both God and the sun are described.
As this sun with his force and light gladdens (so to speak). the earth and the crops etc. with all the objects, being the greatest in measure and extension, so O Omnipresent God Thou art the Greatest and the Best, being present with all the objects of the world and perfectly knowing them all as Omniscient Supreme Being, enablest us to get food and thereby gladdenest us by Thy wonderful Power.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात इन्द्र शब्दाच्या अर्थाचे वर्णन, उत्तम उत्तम धनप्राप्तीसाठी ईश्वराची प्रार्थना व पुरुषार्थ करण्याच्या आज्ञेचे प्रतिपादन केल्यामुळे या नवव्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती आठव्या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर आहे असे समजले पाहिजे. या सूक्ताचाही अर्थ सायणाचार्य इत्यादी आर्यावर्तवासी व विल्सन इत्यादी इंग्रजांनी सर्वस्वी मंत्राच्या विरुद्ध वर्णिलेला आहे.
