ए॒वा ह्य॑स्य सू॒नृता॑ विर॒प्शी गोम॑ती म॒ही। प॒क्वा शाखा॒ न दा॒शुषे॑॥
evā hy asya sūnṛtā virapśī gomatī mahī | pakvā śākhā na dāśuṣe ||
ए॒व। हि। अ॒स्य॒। सू॒नृता॑। वि॒ऽर॒प्शी। गोऽम॑ती। म॒ही। प॒क्वा। शाखा॑। न। दा॒शुषे॑॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
उक्त अर्थों के निमित्त और कार्य्य का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सूनृता - वेदवाणी
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनस्तन्निमित्तकार्य्यमुपदिश्यते।
पक्वा शाखा न इवास्य हि गोमती सूनृता विरप्शी मही दाशुषे सुखं पिन्वते॥८॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
Verily the speech of this Omniscient God contained in four Vedas absolutely true and sweet, great, full of great knowledge and wisdom, is to be held in great honor by all. It is like a branch loaded with ripe fruits, for a scholar who is deeply engaged in its study.
