एन्द्र॑ सान॒सिं र॒यिं स॒जित्वा॑नं सदा॒सह॑म्। वर्षि॑ष्ठमू॒तये॑ भर॥
endra sānasiṁ rayiṁ sajitvānaṁ sadāsaham | varṣiṣṭham ūtaye bhara ||
आ। इ॒न्द्र॒। सा॒न॒सिम्। र॒यिम्। स॒ऽजित्वा॑नम्। स॒दा॒ऽसह॑म्। वर्षि॑ष्ठम्। ऊ॒तये॑। भ॒र॒॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब अष्टमसूक्त के प्रथम मन्त्र में यह उपदेश है कि ईश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से कैसा धन प्राप्त करना चाहिये-
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
वर्षिष्ठ रयि
स्वामी दयानन्द सरस्वती
तत्र कीदृशं धनमीश्वरानुग्रहेण स्वपुरुषार्थेन च प्रापणीयमित्युपदिश्यते।
हे इन्द्र ! कृपयाऽस्मदूतये वर्षिष्ठं सानसिं सदासहं सजित्वानं रयिमाभर॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What kind of wealth should be obtained by the Grace of God and by one's own exertion is taught in the Ist Mantra of the hymn.
O God Giver of great wealth, grant to us from all sides wealth that gives delight, that is distributed among the needy, is enjoyable source of victory, the humbler of foes, abundant, most excellent and giver of power of putting up with all troubles.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)याप्रमाणे जी माणसे ईश्वराची उपासना व वेदोक्त कर्म करणारी आहेत, ती ईश्वराची आश्रित बनून वेदविद्येने आत्म्याचे सुख व उत्तम क्रिया करून शारीरिक सुख प्राप्त करतात. त्यांनी परमेश्वराचीच प्रशंसा करावी, या अभिप्रायाने या आठव्या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वोक्त सातव्या सूत्राच्या अर्थाबरोबर संगती जाणावी.
