जु॒षस्व॑ स॒प्रथ॑स्तमं॒ वचो॑ दे॒वप्स॑रस्तमम्। ह॒व्या जुह्वा॑न आ॒सनि॑ ॥
juṣasva saprathastamaṁ vaco devapsarastamam | havyā juhvāna āsani ||
जु॒षस्व॑। स॒प्रथः॑ऽतमम्। वचः॑। दे॒वप्स॑रःऽतमम्। ह॒व्या। जुह्वा॑नः। आ॒सनि॑ ॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब ७५ पचहत्तरवें सूक्त का आरम्भ किया जाता है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् लोग कैसे हों, इस विषय का उपदेश किया है ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
सात्त्विक भोजन व ज्ञानप्रवणता
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्विद्वान् कीदृशो भवेदित्युपदिश्यते ॥
हे विद्वन्नासनि हव्या जुह्वानस्त्वं यो विदुषां व्यवहारस्तं सप्रथस्तमं देवप्सरस्तमं वचश्च जुषस्व ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
O learned person, take eatable good articles of diet in thy mouth, the liberal conduct of enlightened persons and the speech which is acceptable to them.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात ईश्वर, अग्नी व विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताबरोबर पूर्वसूक्तार्थाची संगती समजली पाहिजे. ॥
