वांछित मन्त्र चुनें
966 बार पढ़ा गया

ह्वया॑म्य॒ग्निं प्र॑थ॒मं स्व॒स्तये॒ ह्वया॑मि मि॒त्रावरु॑णावि॒हाव॑से । ह्वया॑मि॒ रात्रीं॒ जग॑तो नि॒वेश॑नीं॒ ह्वया॑मि दे॒वं स॑वि॒तार॑मू॒तये॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

hvayāmy agnim prathamaṁ svastaye hvayāmi mitrāvaruṇāv ihāvase | hvayāmi rātrīṁ jagato niveśanīṁ hvayāmi devaṁ savitāram ūtaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ह्वया॑मि । अ॒ग्निम् । प्र॒थ॒मम् । स्व॒स्तये । ह्वया॑मि । मि॒त्रावरु॑णौ । इ॒ह । अव॑से । ह्वया॑मि । रात्री॑म् । जग॑तः । नि॒वेश॑नीम् । ह्वया॑मि । दे॒वम् । स॒वि॒तार॑म् । ऊ॒तये॑॥

966 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:35» मन्त्र:1 | अष्टक:1» अध्याय:3» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:7» मन्त्र:1


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब पैंतीसवे सूक्त का आरंभ है। उसके पहिले मंत्र से अग्नि आदि के गुणों को जान के सब प्रयोजनों को सिद्ध करे, इस विषय का वर्णन किया है।

पदार्थान्वयभाषाः - मैं (इह) इस शरीर धारणादि व्यवहार में (स्वस्तये) उत्तम सुख होने के लिये (प्रथमम्) शरीर धारण के आदि साधन (अग्निम्) रूप गुण युक्त अग्नि को (मित्रावरुणौ) तथा प्राण वा उदान वायु को (ह्वयामि) स्वीकार करता हूँ (जगतः) संसार को (निवेशनीम्) निद्रा में निवेश करानेवाली (रात्रीम्) सूर्य के अभाव से अन्धकार रूप रात्रि को (ह्वयामि) प्राप्त होता हूँ (ऊतये) क्रियासिद्धि की इच्छा के लिये (देवम्) द्योतनात्मक (सवितारम्) सूर्यलोक को (ह्वयामि) ग्रहण करता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि दिनरात सुख के लिये अग्नि वायु और सूर्य के सकाश से उपकार को ग्रहण करके सब सुखों को प्राप्त होवें क्योंकि इस विद्या के विना कभी किसी पुरुष को पूर्ण सुख का संभव नहीं हो सकता ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आह्वान [पुकार]

पदार्थान्वयभाषाः - १. मैं (प्रथमम्) - सबसे पहले (स्वस्तये) - उत्तम स्थिति के लिए, अविनाश के लिए (अग्निम्) - उस अग्रणी प्रभु को (ह्वयामि) - पुकारता हूँ । प्रभु की प्रार्थना से ही अपनी चित्तवृत्ति को हम विषय - पराङ्मुख कर पाते हैं । यह विषयों में न फँसना ही कल्याण का, अविनाश का कारण व साधन है ।  २. (इह) - इस मानव - जीवन में (अवसे) - अपने रक्षण के लिए (मित्रावरुणौ) - प्राण व उदान वायु को अथवा स्नेह व द्वेषनिवारण के देवता को मैं (ह्वयामि) - पुकारता हूँ । शरीर के रक्षण के लिए प्राण व उदान का ठीक से कार्य करना आवश्यक है । प्राण का कार्य ठीक चलने पर हमारे शरीर में शक्ति होती है और हम सबके साथ स्नेह करनेवाले बनते हैं । उदान हमारे कण्ठदेश की ग्रन्थियों को ठीक रखती हुई हमें जितेन्द्रिय बनने में सहायक होती है, और हमें द्वेष से ऊपर उठाती है ।  ३. (जगतोः) - सम्पूर्ण क्रियाशील प्राणियों को दिनभर के कार्य के अनन्तर (निवेशनीम्) - अपने अन्दर निवास देनेवाली (रात्रीम्) - रात्रि को, इस रमयित्री निद्रा की गोद में ले - जानेवाली रात को (ह्वयामि) - पुकारता हूँ । वस्तुतः रात्रि की निद्रा स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है ।  ४. (ऊतये) - इस स्वास्थ्य के रक्षण के लिए ही मैं रात्रि की समाप्ति पर उदय होनेवाले (देवम्) - प्रकाशमय, सारे संसार को प्रकाशित करनेवाले तथा प्राणशक्ति देनेवाले [देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा, द्योतनाद्वा] (सवितारम्) - सबको कर्मों में प्रेरित करनेवाले सूर्य को (ह्वयामि) - पुकारता हूँ । 'सूर्याभिमुख होकर सन्ध्या में स्थित होना' ही सूर्य को पुकारना है । यह 'हिरण्यपाणि' सूर्य हमारे अन्दर अपनी सुनहरी किरणों से प्राणशक्ति को भरनेवाला होता है ।   
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम अविनाश व रक्षण के लिए उस सर्वाग्रणी प्रभु को पुकारते हैं । प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हमारे प्राण व उदान ठीक हों, हम स्नेह व निर्द्वेषतावाले हों, प्रतिदिन नींद ठीक से आये और हम प्रातः प्रबुद्ध हों, प्राङ्मुख होकर [सूर्याभिमुख] प्रभु - प्रार्थना करनेवाले हों ।   

स्वामी दयानन्द सरस्वती

(ह्वयामि) स्पर्धामि (अग्निम्) रूपगुणम् (प्रथमम्) जीवनस्यादिमनिमित्तम् (स्वस्तये) सुशोभनमिष्टं सुखमस्ति यस्मात्तस्मै सुखाय (ह्वयामि) स्वीकरोमि (मित्रावरुणौ) मित्रः प्राणो वरुण उदानस्तौ (इह) अस्मिन् शरीरधारणादिव्यवहारे (अवसे) रक्षणाद्याय (ह्वयामि) प्राप्नोमि (रात्रिम्) सूर्याभावादंधकाररूपाम् (ह्वयामि) गृह्णामि (देवम्) द्योतनात्मकं (सवितारम्) सूर्यलोकम् (ऊतये) क्रियासिद्धीच्छायै ॥१॥

अन्वय:

अग्न्यादिगुणान् विज्ञाय कृत्यं सिद्धं कुर्य्यादित्युपदिश्यन्ते।

पदार्थान्वयभाषाः - अहमिह स्वस्तये प्रथममग्निं ह्वयाम्यवसे मित्रावरुणौ ह्वयामि जगतो निवेशनीं रात्रीं ह्वयाम्यूतये सवितारं देवं ह्वयामि ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यैरहर्निशं सुखायाग्निवायुसूर्याणां सकाशादुपयोगं गृहीत्वा सर्वाणि सुखानि प्राप्याणि नैतदादिना विना कदाचित् कस्यचित् सुखं संभवतीति ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I invoke Agni, vital heat, first basic sustainer of life, for physical well-being. I invoke Mitra-and-Varuna, pranic energies of the breath of life, for protection and immunity. I invoke the night which envelops the world in restful sleep. And I invoke Savita, the sun, lord of light, refreshment and inspiration for the sake of protection, promotion and advancement here upon the earth.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

One should know the attributes of Agni, Mitra, Varuna and others and then should accomplish all works is taught in the first Mantra.

अन्वय:

I first invoke Agni (fire here for our protection and happiness. I invoke for protection Mitra and Varuna (Praana and Udana two vital breaths. I invoke or call on Ratri ( Night) which brings rest to the world and I call for preservation and the accomplishment of works the bright solar world.

पदार्थान्वयभाषाः - (स्वस्तये) सुशोभनम् इष्टं सुखमस्ति यस्मात् तस्मै सुखाय = For desirable happiness. (मित्रावरुणौ ) मित्रः प्राणः वरुणः उदानः तौ । = Prana and Udana two vital energies. (सवितारम्) सूर्यलोकम् = The solar world. ( ऊतये ) क्रियासिद्धीच्छाये = For the desire of the accomplishment of the works.
भावार्थभाषाः - Men should day and night utilize properly the fire air and sun and then attain happiness. Without this, none can enjoy happiness.
टिप्पणी: Rishi Dayananda has interpreted मित्रावरुणौ here as मित्रः प्राणाः वरुणः उदान: तौ Mitra and Varuna or two vital energies. Though unfortunately, he has not quoted any authority, such authority is clearly found in several passages of the Brahmanas, as the following quotations show. प्राणोदानौ वै मित्रावरुणौ (शतपथ १.८.३२, ३.६.१.१६) प्राणोदानौ मित्रावरुणौ (शतपथ ३.२.२.१३ ) So Rishi Dayananda's interpretation is well-authenticated. The word ऊति: is derived from अव अवतेः क्रिमि ज्वर त्वारश्रीव्यबिमवामुपधायाश्च (अष्टा० ६.४.२०) इत्यादिना वकारस्य उपधायाश्च ऊद् उति यूतिजूति सातिहेति कीर्तयश्च (अष्टा० ३.३.९७) इत्यादिना क्लिन: उदात्तत्वम् । As ooti ( ऊति ) is derived from अव which has 19 meanings Rishi Dayananda has taken it to mean क्रियासिद्धीच्छायै ।

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)

या सूक्तात सूर्य, वायू व ईश्वराच्या गुणांचे प्रतिपादन केल्यामुळे चौतिसाव्या सूक्ताबरोबर या सूक्ताची संगती जाणावी.

भावार्थभाषाः - माणसांनी दिवस-रात्र सुखासाठी अग्नी, वायू व सूर्यप्रकाश यांचा उपयोग करून घ्यावा व सर्व सुख प्राप्त करावे कारण या विद्येशिवाय कोणत्याही माणसाला पूर्ण सुख प्राप्त होऊ शकत नाही. ॥ १ ॥