पु॒रु त्वा॑ दा॒श्वान्वो॑चे॒ऽरिर॑ग्ने॒ तव॑ स्वि॒दा। तो॒दस्ये॑व शर॒ण आ म॒हस्य॑ ॥
puru tvā dāśvān voce rir agne tava svid ā | todasyeva śaraṇa ā mahasya ||
पु॒रु। त्वा॒। दा॒श्वान्। वो॒चे॒। अ॒रिः। अ॒ग्ने॒। तव॑। स्वि॒त्। आ। तो॒दस्य॑ऽइव। श॒र॒णे। आ। म॒हस्य॑ ॥ १.१५०.१
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब एकसौ पचासवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके मन्त्र में विद्वानों के गुणों का उपदेश करते हैं ।
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उस महान् प्रेरक की शरण में
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथ विद्वद्गुणानाह ।
हे अग्ने दाश्वानरिरहं महस्य तोदस्येव तव स्विदा शरणे त्वा पुर्वा वोचे ॥ १ ॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
The attributes of God who is symbol of learning are mentioned.
O learned leader ! I have surrendered myself to you and am giver of happiness. I may speak many sweet words to you. I come to you and present myself like a servant in the dwelling of a mighty master, who punishes wicked persons.
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात विद्वानांच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाबरोबर मागच्या सूक्ताच्या अर्थाची संगती जाणली पाहिजे. ॥
