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स हि शर्धो॒ न मारु॑तं तुवि॒ष्वणि॒रप्न॑स्वतीषू॒र्वरा॑स्वि॒ष्टनि॒रार्त॑नास्वि॒ष्टनि॑:। आद॑द्ध॒व्यान्या॑द॒दिर्य॒ज्ञस्य॑ के॒तुर॒र्हणा॑। अध॑ स्मास्य॒ हर्ष॑तो॒ हृषी॑वतो॒ विश्वे॑ जुषन्त॒ पन्थां॒ नर॑: शु॒भे न पन्था॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa hi śardho na mārutaṁ tuviṣvaṇir apnasvatīṣūrvarāsv iṣṭanir ārtanāsv iṣṭaniḥ | ādad dhavyāny ādadir yajñasya ketur arhaṇā | adha smāsya harṣato hṛṣīvato viśve juṣanta panthāṁ naraḥ śubhe na panthām ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः। हि। शर्धः॑। न। मारु॑तम्। तु॒वि॒ऽस्वणिः॑। अप्न॑स्वतीषु। उ॒र्वरा॑सु इ॒ष्टनिः॑। आर्त॑नासु। इ॒ष्टनिः॑। आद॑त्। ह॒व्यानि॑। आ॒ऽद॒दिः। य॒ज्ञस्य॑। के॒तुः। अ॒र्हणा॑। अध॑। स्म॒। अ॒स्य॒। हर्ष॑तः। हृषी॑वतः। विश्वे॑। जु॒ष॒न्त॒। पन्था॑म्। नरः॑। शु॒भे। न। पन्था॑म् ॥ १.१२७.६

ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:127» मन्त्र:6 | अष्टक:2» अध्याय:1» वर्ग:13» मन्त्र:1 | मण्डल:1» अनुवाक:19» मन्त्र:6


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब राजा आदि क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (विश्वे) सब (नरः) व्यवहारों की प्राप्ति करानेवाले मनुष्यो ! तुम (हृषीवतः) जो बहुत आनन्द से भरा (हर्षतः) और जिससे सब प्रकार का आनन्द प्राप्त हुआ (अस्य) इस (यज्ञस्य) सङ्ग करने अर्थात् पाने योग्य व्यवहार की (शुभे) उत्तमता के लिये (न) जैसे हो वैसे (पन्थाम्) धर्मयुक्त मार्ग का (जुषन्त) सेवन करो (अध) इसके अनन्तर जो (केतुः) ज्ञानवान् (आददिः) ग्रहण करनेहारा (अर्हणा) सत्कार किये अर्थात् नम्रता के साथ हुए (हव्यानि) भोजन के योग्य पदार्थों को (आदत्) खावे वा (मारुतम्) पवनों के (शर्धः) बल के (न) समान (अप्नस्वतीषु) जिनके प्रशंसित सन्तान विद्यमान उन (उर्वरासु) सुन्दरी (आर्त्तनासु) सत्य आचरण करनेवाली स्त्रियों के समीप (तुविष्वणिः) जिसकी बहुत उत्तम निरन्तर बोल-चाल (इष्टनिः) और जो सत्कार करने योग्य है (सः, स्म) वही विद्वान् (इष्टनिः) इच्छा करनेवाला (हि) निश्चय के साथ (पन्थाम्) न्याय मार्ग को प्राप्त होने योग्य होता है ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। जो मनुष्य धर्म से इकट्ठे किये हुए पदार्थों का भोग करते हुए प्रजाजनों में धर्म और विद्या आदि गुणों का प्रचार करते हैं, वे दूसरों से धर्ममार्ग का प्रचार करा सकते हैं ॥ ६ ॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथ राजादयः किं कुर्य्युरित्याह ।

अन्वय:

हे विश्वे नरो यूयं हृषीवतो हर्षतोऽस्य यज्ञस्य शुभे न पन्थां जुषन्ताध यं केतुराददिरर्हणा हव्यान्यादन्मारुतं शर्धो नाप्नस्वतीपूर्वरास्वार्त्तनासु तुविष्वणिरिष्टनिरस्ति स स्मेष्टनिर्हि न्यायपन्थां प्राप्तुमर्हति ॥ ६ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - (सः) विद्वान् (हि) खलु (शर्धः) बलम् (न) इव (मारुतम्) मरुतामिमम् (तुविस्वनिः) तुविर्वृद्धा स्वनिरुपदेशो यस्य सः (अप्नस्वतीषु) प्रशस्तमप्नोऽपत्यं विद्यते यासां तासु (उर्वरासु) सुन्दरवर्णयुक्तासु (इष्टनिः) इच्छाविशिष्टः। अत्रेषधातोर्बाहुलकादौणादिकोऽनिः प्रत्ययस्तुगागमश्च। (आर्त्तनासु) या आर्त्तयन्ति सत्ययन्ति (इष्टनिः) यष्टुं योग्यः (आदत्) अद्यात् (हव्यानि) अत्तुमर्हाणि (आददिः) आदाता (यज्ञस्य) सङ्गन्तव्यस्य व्यवहारस्य (केतुः) ज्ञानवान् (अर्हणा) सत्कृतानि (अध) अथ (स्म) एव (अस्य) (हर्षतः) प्राप्तहर्षस्य (हृषीवतः) बह्वाऽऽनन्दयुक्तस्य। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति पूर्वपदस्य दीर्घः। (विश्वे) सर्वे (जुषन्त) सेवन्ताम् (पन्थाम्) पन्थानम् (नरः) नायकाः (शुभे) शोभनाय (न) इव (पन्थाम्) धर्म्यं मार्गम्। अत्र वर्णव्यत्ययेन नस्य स्थाने अकारादेशः ॥ ६ ॥
भावार्थभाषाः - अत्रोपमालङ्कारौ। ये मनुष्या धर्मेणोपार्जितानां पदार्थानां भोगं कुर्वन्तः प्रजासु धर्मविद्याः प्रचारयन्ति ते धर्ममार्गं प्रचारयितुं शक्नुवन्ति ॥ ६ ॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - या मंत्रात दोन उपमालंकार आहेत. जी माणसे धर्माने एकत्र केलेल्या पदार्थांचा भोग करीत प्रजेत धर्म व विद्या इत्यादी गुणांचा प्रसार करतात. ती दुसऱ्याकडून धर्ममार्गाचा प्रचार करवू शकतात. ॥ ६ ॥