Word-Meaning: - (सः इन्दुः) = वह सोम (वाम्) = आप दोनों (मानवी) = मानव हितकारी (रोदसी) = द्यावापृथिवी को, मस्तिष्क व शरीर को (जनिष्ट) = प्रादुर्भूत करता है। मस्तिष्क व शरीर के विकास के द्वारा यह सोम यज्ञेषु यज्ञों में हमें प्रवृत्त करता है। यज्ञों के निमित्त ही तो सोम शरीर को शक्तिशाली व मस्तिष्क को ज्ञान दीप्त बनाता है। यह (देवः) = प्रकाशमय सोम (देवी) = प्रकाशमय द्यावापृथिवी को ही उत्पन्न करता है, शरीर को तेजोमय व मस्तिष्क को ज्ञानदीप्त करता है। यह तो सोम (गिरिष्ठाः) = ज्ञान की वाणियों में स्थित है, ज्ञान की वृद्धि का कारण बनता है । (तम्) = उस सोम को (तुविष्वणि) = [तुवि much स्वन-शोर] बहुत शोर में, व्यर्थ की बातों में (अस्त्रेधन्) = हिंसित कर देते हैं। बहुत बोलना सोमरक्षण के अनुकूल नहीं। मौन सोमरक्षण में सहायक होता है। बहुत न बोलकर कर्म में लगे रहना ही सोमरक्षण का साधन है ।
Connotation: - भावार्थ- सोम मस्तिष्क व शरीर दोनों को मानवहितकारी व प्रकाशमय बनाता है। ऐसे बनकर हम यज्ञों में प्रवृत्त होते हैं। बहुत बोलना व कर्म न करना, सोमरक्षण का विरोधी है।