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परि॒ त्यं ह॑र्य॒तं हरिं॑ ब॒भ्रुं पु॑नन्ति॒ वारे॑ण । यो दे॒वान्विश्वाँ॒ इत्परि॒ मदे॑न स॒ह गच्छ॑ति ॥

English Transliteration

pari tyaṁ haryataṁ harim babhrum punanti vāreṇa | yo devān viśvām̐ it pari madena saha gacchati ||

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Pad Path

परि॑ । त्यम् । ह॒र्य॒तम् । हरि॑म् । ब॒भ्रुम् । पु॒न॒न्ति॒ । वारे॑ण । यः । दे॒वान् । विश्वा॑न् । इत् । परि॑ । मदे॑न । स॒ह । गच्छ॑ति ॥ ९.९८.७

Rigveda » Mandal:9» Sukta:98» Mantra:7 | Ashtak:7» Adhyay:4» Varga:24» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:6» Mantra:7


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (त्यम्) उक्त परमात्मा (हरिम्) जो अनन्त प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करता है, (हर्यतम्) जो सर्वप्रिय है, (बभ्रुम्) ज्ञानस्वरूप है, (वारेण) वरणीय से वरणीय पदार्थों द्वारा जिसकी उपासना करते हैं और (यः) जो (विश्वान्) सब (देवान्) विद्वानों को (इत्) ही (मदेन) परमानन्द के (सह) साथ (परिपुनन्ति) पवित्र करता है, (परिगच्छति) वह सर्वत्र प्राप्त है ॥७॥
Connotation: - इस मन्त्र में परमात्मा का स्वातन्त्र्य-वर्णन किया है ॥७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मदेन सह

Word-Meaning: - (त्यम्) = उस (हर्यतम्) = सबसे स्पृहणीय कान्त, (हरिम्) = दुःखों व रोगों का हरण करनेवाले, (बभ्रुम्) = धारण करनेवाले सोम को (वारेण) = वासनाओं के निवारण के द्वारा (परिपुनन्ति) = सर्वथा पवित्र करते हैं। सोम शुद्धि के लिये अपने को वासनाओं से बचाना ही एकमात्र उपाय है। उस सोम को पवित्र करते हैं, (यः) = जो (विश्वान् देवान्) = सब देववृत्ति के पुरुषों को (इत्) = ही (मदेन सह) = उल्लास के साथ परि गच्छति शरीर में चारों ओर प्राप्त होता है । सोमरक्षण देववृत्ति वाले पुरुष ही कर पाते हैं । सुरक्षित सोम उल्लास का जनक होता है ।
Connotation: - भावार्थ - वासनाओं का निवारण करते हुए देव पुरुष ही सोम का पान करते हैं, यह सुरक्षित सोम जीवन में उल्लास का कारण बनता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (त्यं) उक्तपरमात्मानं (हरिं) सृष्टेर्लयादिकर्तारं (हर्यतं) सर्वप्रियं (बभ्रुं) ज्ञानस्वरूपं (वारेण) वरणीयतमपदार्थेनोपासते (यः) यश्च (विश्वान्, देवान्) सर्वविदुषः (इत्) हि (मदेन) आनन्देन (सह) साकं (परि पुनन्ति) परितः पावयति (परि गच्छति) सर्वत्र व्याप्नोति च ॥७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Ten psychic powers with the best of their potential adore and exalt that dear divinity, omniscience itself, who, omnipresent, pervades and rejoices with all divinities of the world with divine ecstasy.