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अ॒भि वा॒युं वी॒त्य॑र्षा गृणा॒नो॒३॒॑ऽभि मि॒त्रावरु॑णा पू॒यमा॑नः । अ॒भी नरं॑ धी॒जव॑नं रथे॒ष्ठाम॒भीन्द्रं॒ वृष॑णं॒ वज्र॑बाहुम् ॥

English Transliteration

abhi vāyuṁ vīty arṣā gṛṇāno bhi mitrāvaruṇā pūyamānaḥ | abhī naraṁ dhījavanaṁ ratheṣṭhām abhīndraṁ vṛṣaṇaṁ vajrabāhum ||

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Pad Path

अ॒भि । वा॒युम् । वी॒ती । अ॒र्ष॒ । गृ॒णा॒नः । अ॒भि । मि॒त्रावरु॑णा । पू॒यमा॑नः । अ॒भि । नर॑म् । धी॒ऽजव॑नम् । र॒थे॒ऽस्थाम् । अ॒भि । इन्द्र॑म् । वृष॑णम् । वज्र॑ऽबाहुम् ॥ ९.९७.४९

Rigveda » Mandal:9» Sukta:97» Mantra:49 | Ashtak:7» Adhyay:4» Varga:20» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:6» Mantra:49


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सोम) हे सर्वोत्पादक परमात्मन् ! आप (वायुम्) ज्ञानयोगी की (वीती) तृप्ति के लिये (अभ्यर्ष) प्राप्त हों (गृणानः) उपास्यमान आप (मित्रावरुणा) अध्यापक और उपदेशक को (अभ्यर्ष) प्राप्त हों, (पूयमानः) सबको पवित्र करते हुए आप (धीजवनं, नरम्) कर्मयोगी पुरुष को (अभ्यर्ष) प्राप्त हों, (रथेष्ठाम्) जो कर्मों की गति में स्थिर हैं, उनको प्राप्त हों, (वज्रबाहुम्) वज्र के समान भुजाओंवाले (इन्द्रं) योद्धा पुरुष को (वृषणम्) जो बलस्वरूप है, उसको प्राप्त हों ॥४९॥
Connotation: - इस मन्त्र में परमात्मा की प्राप्ति के पात्र ज्ञानयोगी, कर्मयोगी और शूरवीरों का वर्णन किया है। तात्पर्य यह है कि जो पुरुष परमात्मा की कृपा का पात्र बनना चाहे, उसे स्वयं उद्योगी वा कर्मयोगी अथवा शूरवीर बनना चाहिये, क्योंकि परमात्मा स्वयं बलस्वरूप है, इसलिये जो बलिष्ठ पुरुष हैं, वे उसकी कृपा का पात्र बन सकते हैं, अन्य नहीं ॥४९॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सोम का पान कौन-कौन करते हैं ?

Word-Meaning: - हे सोम ! (गृणानः) = स्तुति किया जाता हुआ तू (वायुं अभिः) = क्रियाशील पुरुष के प्रति (वीती अर्षा) = पान के लिये गतिवाला हो । क्रियाशील पुरुष सोम का रक्षण करनेवाला बनता है । (पूयमानः) = पवित्र किया जाता हुआ तू (मित्रावरुणा अभि) = मित्र और वरुण की ओर प्राप्त हो । सबके प्रति स्नेह व निर्देषता के भाव वाला व्यक्ति तेरा पान करे। (धीजवनम्) = बुद्धि के वेग वाले अर्थात् बुद्धि को खूब बढ़ानेवाले (रथेष्ठाम्) = शरीररथ के अधिष्ठाता बननेवाले (नरम्) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले मनुष्य को तू (अभि) = [अर्षा] प्राप्त हो। यह 'धीजवनं रथेष्ठा नर' तेरा पान करनेवाला हो । तू (इन्द्रं) = उस जितेन्द्रिय पुरुष को (अभि) [अर्ष] = प्राप्त हो, जो कि (वृषणम्) = अपने अन्दर शक्ति का सेचन करता है, और अतएव (वज्रबाहुम्) = क्रियाशीलतारूप वज्र को हाथ में लिये हुए है ।
Connotation: - भावार्थ- सोम का पान 'क्रियाशील [वायु], स्नेह की भावना वाला [मित्र] व द्वेष का निवारण करनेवाला [वरुण], बुद्धिपूर्वक कार्य करनेवाला [ धीजवन], जितेन्द्रिय [इन्द्र] ' पुरुष ही करता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सोम) हे परमात्मन् ! (वायुं) कर्मयोगिनं (वीती) तृप्तये (अभि, अर्ष) प्राप्नोतु (गृणानः) उपास्यमानश्च (मित्रावरुणा) अध्यापकोपदेशकान् (अभि, अर्ष) प्राप्नोतु (पूयमानः) पावयन् भवान् (धीजवनं, नरं) कर्मयोगिपुरुषं (अभि, अर्ष) प्राप्नोतु (रथेष्ठां) कर्मगत्यां स्थितं च प्राप्नोतु (वज्रबाहुं) दृढभुजं (वृषणं) बलिनं (इन्द्रं) योधं च प्राप्नोतु ॥४९॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, pure and purifying, resounding across the spaces, flow, sung and celebrated, and bring peace, progress and fulfilment to humanity, to the man of vibrant enthusiasm, to the man of love and judgement. To humanity, bring readiness of intellect and understanding, firm and undisturbed yet dynamic like a master of the chariot sitting at peace, unmoving and undisturbed, while the chariot may be speeding at the velocity of light. So also flow to Indra, master ruler of the arms of thunder, virile and generous, mighty yet calm.