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कनि॑क्रन्ति॒ हरि॒रा सृ॒ज्यमा॑न॒: सीद॒न्वन॑स्य ज॒ठर॑ऋ पुना॒नः । नृभि॑र्य॒तः कृ॑णुते नि॒र्णिजं॒ गा अतो॑ म॒तीर्ज॑नयत स्व॒धाभि॑: ॥

English Transliteration

kanikranti harir ā sṛjyamānaḥ sīdan vanasya jaṭhare punānaḥ | nṛbhir yataḥ kṛṇute nirṇijaṁ gā ato matīr janayata svadhābhiḥ ||

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Pad Path

कनि॑क्रन्ति । हरिः॑ । आ । सृ॒ज्यमा॑नः । सीद॑न् । वन॑स्य । ज॒ठरे॑ । पु॒ना॒नः । नृऽभिः॑ । य॒तः । कृ॒णु॒ते॒ । निः॒ऽनिज॑म् । गाः । अतः॑ । म॒तीः । ज॒न॒य॒त॒ । स्व॒धाभिः॑ ॥ ९.९५.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:95» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:4» Varga:5» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:5» Mantra:1


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (हरिः) हरणशील शक्तियोंवाला परमात्मा (सृज्यमानः) साक्षात्कार को प्राप्त होता है। तब (वनस्य) भक्त के (जठरे) अन्तःकरण में (सीदन्) ठहरता हुआ और (पुनानः) उसको पवित्र करता हुआ विराजमान होता है। (यतः) जिसलिये (नृभिः) मनुष्यों द्वारा (निर्णिजं कृणुते) साक्षात्कार किया जाता है, तब (गाः) इन्द्रियों को शुद्ध करके (मतिर्जनयत) अच्छे प्रकार की बुद्धि उत्पन्न करता है (स्वधाभिः) स्वशक्तियों के द्वारा और (कनिक्रन्ति) पुनः शब्दायमान के समान साक्षात्कार को प्राप्त होता है ॥१॥
Connotation: - वास्तव में परमात्मा सर्वव्यापक है। उसके लिये विराजमान होना और विराजमान न होना कथन नहीं किया जा सकता। विराजमान होना यहाँ साक्षात्कार के अभिप्राय से कथन किया गया है ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

निर्णिजं गाः कृणुते

Word-Meaning: - (आसृज्यमानः) = शरीर में चारों ओर उत्पन्न किया जाता हुआ (हरिः) = दुःखहर्ता सोम (कनिक्रन्ति) = प्रभु के स्तवन के शब्दों का उच्चारण करता है। शरीर में सुरक्षित सोम हमें प्रभुस्तवन की ओर झुकाता है । (पुनानः) = पवित्र किया जाता हुआ सोम (वनस्य) = उपासक के (जठरे) = उदर में (सीदन्) = स्थित होता है। अर्थात् वासनाओं के उबाल से शून्य यह सोम उपासक के शरीर में सुरक्षित रहता है। (नृभिः यतः) = उन्नतिपथ पर चलनेवाले लोगों से संयत किया हुआ सोम (निर्णिजम्) = शोधन व पोषण को तथा (गाः) = ज्ञान की वाणियों को कृणुते करता है। शरीर को यह पुष्ट बनाता है [पोषण], मन को शुद्ध करता है [शोधन] तथा मस्तिष्क को ज्ञान सम्पन्न बनाता है । (अतः) = इस सोम के द्वारा (स्वधाभिः) = आत्मधारणशक्तियों के साथ (मतीः जनयत) = प्रकृष्ट बुद्धियों को उत्पन्न करो ।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम हमें पुष्ट शरीर वाला, शुद्ध मन वाला तथा ज्ञानदीप्त मस्तिष्क वाला बनाता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (हरिः) हरणशीलशक्तिमान् परमात्मा (सृज्यमानः) साक्षात्कारं प्राप्नोति तदा (वनस्य) भक्तस्य (जठरे) अन्तःकरणे (सीदन्) स्थितिं कुर्वन् (पुनानः) तं पावयंश्च विराजते (यतः) यस्मात् (नृभिः) मनुष्यैः (निर्णिजं, कृणुते) साक्षात्क्रियते तदा (गाः) इन्द्रियाणि शोधयन् (मतीः, जनयत) सुमतिमुत्पादयति (स्वधाभिः) स्वशक्तिभिः (कनिक्रन्ति) पुनः पुनः शब्दायमान इव साक्षात्कारं लभते ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Soma, divine spirit blithe and blissful, saviour and sustainer, invoked in meditation, abiding in the heart core of the soul, pure and purifying, vibrates loud and bold. Served and adored and celebrated by devotees, it renders the senses, mind and intelligence pure and immaculate and then it gives rise to spontaneous songs of praise offered with complete surrender and self- sacrifice.