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अ॒यं सोम॑ इन्द्र॒ तुभ्यं॑ सुन्वे॒ तुभ्यं॑ पवते॒ त्वम॑स्य पाहि । त्वं ह॒ यं च॑कृ॒षे त्वं व॑वृ॒ष इन्दुं॒ मदा॑य॒ युज्या॑य॒ सोम॑म् ॥

English Transliteration

ayaṁ soma indra tubhyaṁ sunve tubhyam pavate tvam asya pāhi | tvaṁ ha yaṁ cakṛṣe tvaṁ vavṛṣa indum madāya yujyāya somam ||

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Pad Path

अ॒यम् । सोमः॑ । इ॒न्द्र॒ । तुभ्य॑म् । सु॒न्वे॒ । तुभ्य॑म् । प॒व॒ते॒ । त्वम् । अ॒स्य॒ । पा॒हि॒ । त्वम् । ह॒ । यम् । च॒कृ॒षे । त्वम् । व॒वृ॒षे । इन्दु॑म् । मदा॑य । युज्या॑य । सोम॑म् ॥ ९.८८.१

Rigveda » Mandal:9» Sukta:88» Mantra:1 | Ashtak:7» Adhyay:3» Varga:24» Mantra:1 | Mandal:9» Anuvak:5» Mantra:1


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे कर्म्मयोगिन् ! (तुभ्यं सुन्वे) तुम्हारे संस्कार के लिये (अयं सोमः) यह सोम परमात्मा (तुभ्यं पवते) तुमको पवित्र करता है। (त्वं) तुम (अस्य) इसकी आज्ञा को (पाहि) पालन करो। (त्वं) तुम (यं) जिस (इन्दुं) प्रकाशरूप (सोमं) परमात्मा की (चकृषे) उपासना करते हो, वह (त्वं) तुम्हारे (ववृषे) वरण करने के लिये और (मदाय) आनन्द देने के लिये स्वीकार करता है, इसलिये तुम (युज्याय) अपनी सहायता के लिये (सोमं) सोमरूप परमात्मा की उपासना करो ॥१॥
Connotation: - जो लोग परमात्मा को शुद्धभाव से वर्णन करते हैं, परमात्मा उनको अवश्यमेव शुद्धि प्रदान करता है ॥१॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

मदाय युज्याय

Word-Meaning: - हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (अयं सोमः) = यह सोम (तुभ्यं सुन्वे) = तेरे लिये उत्पन्न किया जाता है, (तुभ्यं पवते) = तेरे लिये ही यह पवित्रता को करनेवाला होता है । (त्वम्) = तू (अस्य पाहि) = इसका रक्षण कर । (त्वं) = तू (ह) = निश्चय से (यं इन्दुम्) = जिस सोम को (चकृषे) = उत्पन्न करता है और जिस (सोमम्) = सोम को ववृषे तू वृत करता है [वृ] अथवा शरीर में सिक्त करता है [वृष्] वह सोम तेरे (मदाय) = उल्लास के लिये होता है और (युज्याय) = प्रभु के साथ मेल के लिये होता है ।
Connotation: - भावार्थ-जितेन्द्रिय पुरुष ही सोम का रक्षण कर पाता है। रक्षित सोम उसे उल्लासयुक्त करता है और प्रभु प्राप्ति के योग्य बनाता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे कर्म्मयोगिन् (तुभ्यं, सुन्वे) तव संस्काराय (अयं, सोमः) अयं सोमः परमात्मा (तुभ्यं, पवते) त्वां पवित्रयति। (त्वं) पूर्वोक्तस्त्वं (अस्य) अमुष्याज्ञा (पाहि) रक्ष। (त्वं) पूर्वोक्तस्त्वं (यं) यस्य (इन्दुं) प्रकाशस्वरूपस्य (सोमं) परमात्मनः (चकृषे) उपासनां करोषि, सः (त्वं) तव (ववृषे) वरणाय (मदाय) आनन्ददानाय च स्वीकरोति त्वाम् अतस्त्वं (युज्याय) स्वसाहाय्याय (सोमं) सोमस्वरूपपरमात्मन उपासनां कुरु ॥१॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, O soul of life, O man, this soma spirit of life and light, this beauty and joy is created for you; it flows, illuminates and sanctifies, for you; take it, live it, protect and advance it, don’t destroy it. Indeed you create it, it is your choice to create it. And whatever you do and choose to do is for your mutual joy and indispensable togetherness. O man, enjoy the beauty and vibrancy of life, maintain and advance it for peace in mutual interest in a spirit of interdependence and cooperation.