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ए॒ष स्य ते॒ मधु॑माँ इन्द्र॒ सोमो॒ वृषा॒ वृष्णे॒ परि॑ प॒वित्रे॑ अक्षाः । स॒ह॒स्र॒साः श॑त॒सा भू॑रि॒दावा॑ शश्वत्त॒मं ब॒र्हिरा वा॒ज्य॑स्थात् ॥

English Transliteration

eṣa sya te madhumām̐ indra somo vṛṣā vṛṣṇe pari pavitre akṣāḥ | sahasrasāḥ śatasā bhūridāvā śaśvattamam barhir ā vājy asthāt ||

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Pad Path

ए॒षः । स्यः । ते॒ । मधु॑ऽमान् । इ॒न्द्र॒ । सोमः॑ । वृषा॑ । वृष्णे॑ । परि॑ । प॒वित्रे॑ । अ॒क्षा॒रिति॑ । स॒ह॒स्र॒ऽसाः । श॒त॒ऽसाः । भू॒रि॒ऽदावा॑ । श॒श्व॒त्ऽत॒मम् । ब॒र्हिः । आ । वा॒जी । अ॒स्था॒त् ॥ ९.८७.४

Rigveda » Mandal:9» Sukta:87» Mantra:4 | Ashtak:7» Adhyay:3» Varga:22» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:5» Mantra:4


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे जगदीश्वर ! (सोमः) आप सोमस्वभाव हैं और (वृषा) सब कामनाओं के देनेवाले हैं तथा (पवित्रे) पवित्र अन्तःकरणों में आप (पर्यक्षाः) आनन्द की वृष्टि करनेवाले हैं। (वृष्णे) हे व्यापक परमात्मन् ! (एषः स्यः) वो ये (ते) तुम्हारा (मधुमान्) मधुरतादि गुणों को देनेवाला (भूरिदावा) जो अनन्त प्रकार की कामनाओं को देनेवाला है, (शश्वत्तमम्) निरन्तर फल उत्पन्न करनेवाला (बर्हिः) जो यज्ञ है तथा (वाजी) बलयुक्त है, उसको आप (अस्थात्) अपनी सत्ता से सुशोभित करते हैं ॥४॥
Connotation: - बर्हिः, इति ‘अन्तरिक्षनामसु पठितम्’ नि. अ.।२। खं. १। बर्हिः शब्द के मुख्यार्थ अन्तरिक्ष हैं। जिस प्रकार अन्तरिक्ष नाना प्रकार की ज्योतियों का आधार और अनन्त प्रकार कामनारूप वृष्टियों का आधार है, इसी प्रकार यज्ञ भी अन्तरिक्ष के समान विस्तृत है। यहाँ रूपकालङ्कार से यज्ञ को बर्हिःरूप से वर्णन किया है ॥४॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

'सहस्रसाः शतसाः भूरिदावा'

Word-Meaning: - हे (इन्द्र) = जितेन्द्रिय पुरुष ! (एषः) = यह (स्यः) = वह प्रसिद्ध (सोमः) = सोम (वृष्णे ते मधुमान्) = अपने अन्दर शक्ति कर सेचन करनेवाले तेरे लिये जीवन को मधुर बनानेवाला है। (वृषा) = यह शक्ति का सेचन करनेवाला है। जो भी इस सोम को अपने अन्दर सिक्त करता है, सोम उसे शक्तिशाली बनाता है । यह सोम (पवित्रे) = पवित्र हृदयवाले पुरुष में (परि अक्षा:) = शरीर में चारों ओर क्षरित होता है । (सहस्रसाः) = सहस्र संख्या ऐश्वर्यों को देनेवाला, (शतसा:) = पूर्ण शतवर्ष के जीवन को देनेवाला, (भूरिदावा) = खूब ही शत्रुओं का यह लवन [काटना] करनेवाला है। यह (वाजी) = शक्तिशाली सोम (शश्वत्तमम्) = सदा (बर्हिः) = वासनाशून्य रूप हृदय में (आ अस्थात्) = सर्वथा स्थित होता है। हृदय में वासनाओं के अभाव में सोम का रक्षण होता है। यह सोम हमें सहस्रों धनों को देता हुआ शतवर्ष के जीवन को देनेवाला होता है और काम-क्रोध आदि शत्रुओं को खूब ही काटनेवाला होता है।
Connotation: - भावार्थ- सुरक्षित सोम जीवन को मधुर बनाता है, यह 'ऐश्वर्य व दीर्घजीवन' को देता है, शत्रुओं को काटता है।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे जगदीश्वर ! (सोमः) सोमस्वभावः। अपि च (वृषा) सर्वकामनानां दातासि तथा (पवित्रे) पवित्रान्तःकरणेषु भवान् (पर्यक्षाः) आनन्दवर्षुकोऽस्ति । (वृष्णे) हे व्यापकपरमात्मन् ! (एषः, स्यः) अयं सः (ते) तव (मधुमान्) मधुरतादिगुणानां दाता (शतसाः, सहस्रसाः) शतसहस्रशक्तीनां निधाता (भूरिदावा) अनेककामपूरकः (शश्वत्तमम्) सन्ततफलोत्पादकः (बर्हिः) यो यज्ञस्तथा (वाजी) बलयुक्तोऽस्ति, तं त्वं (अस्थात्) निजसत्तया सुशोभयसि ॥४॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Indra, omnipotent generous creator and ruler of the universe, this Soma is your honeyed shower of beneficence and grace which profusely flows over and across the immaculate world of life. May this Soma, giving a thousand boons in a hundred forms of infinite values, a mighty victorious divine force, abide by us and bless the universal vedi of human life with eternal grace.