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अ॒स॒श्चत॑: श॒तधा॑रा अभि॒श्रियो॒ हरिं॑ नव॒न्तेऽव॒ ता उ॑द॒न्युव॑: । क्षिपो॑ मृजन्ति॒ परि॒ गोभि॒रावृ॑तं तृ॒तीये॑ पृ॒ष्ठे अधि॑ रोच॒ने दि॒वः ॥

English Transliteration

asaścataḥ śatadhārā abhiśriyo hariṁ navante va tā udanyuvaḥ | kṣipo mṛjanti pari gobhir āvṛtaṁ tṛtīye pṛṣṭhe adhi rocane divaḥ ||

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Pad Path

अ॒स॒श्चतः॑ । श॒तऽधा॑राः । अ॒भि॒ऽश्रियः॑ । हरि॑म् । न॒व॒न्ते । अव॑ । ताः । उ॒द॒न्युवः॑ । क्षिपः॑ । मृ॒ज॒न्ति॒ । परि॑ । गोभिः॑ । आऽवृ॑तम् । तृ॒तीये॑ । पृ॒ष्ठे । अधि॑ । रो॒च॒ने । दि॒वः ॥ ९.८६.२७

Rigveda » Mandal:9» Sukta:86» Mantra:27 | Ashtak:7» Adhyay:3» Varga:17» Mantra:2 | Mandal:9» Anuvak:5» Mantra:27


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (उदन्युवः) प्रेम की (ताः) वे (शतधाराः) सैकड़ों धारायें (असश्चतः) जो नानारूपों में (अभिश्रियः) स्थिति को लाभ कर रही हैं, वे (हरिं) परमात्मा को (अवनवन्ते) प्राप्त होती हैं। (गोभिरावृतं) प्रकाशपुञ्ज परमात्मा को (क्षिपः) बुद्धिवृत्तियें (मृजन्ति) विषय करती हैं। जो परमात्मा (दिवस्तृतीये पृष्ठे) द्युलोक के तीसरे पृष्ट पर विराजमान है और (रोचने) प्रकाशस्वरूप है। उसको बुद्धिवृत्तियें प्रकाशित करती हैं |॥२७॥
Connotation: - द्युलोकादिकों के प्रकाशक परमात्मा को मनुष्य ज्ञान की वृत्तियों से ही साक्षात्कार करता है, अन्यथा नहीं ॥२७॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

साधन पञ्चक

Word-Meaning: - (असश्चतः) = [Not defeated or overcome] अपराजित हुई-हुई वासनाओं से अनाक्रान्त (शतधारा:) = शतवर्ष पर्यन्त अपना धारण करनेवाली, (अभिश्रियः) = प्रातः - सायं प्रभु का उपासना करनेवाली [श्रि सेवायाम्] (उदन्युवः) = रेतः कण रूप उदक की कामनावाली (ताः) = वे प्रजायें (हरि:) = इस दुःखहर्ता सोम को अवनवन्ते अन्दर ही अन्दर प्राप्त करती हैं। ये प्रजाएँ सोम को शरीर के अन्दर स्थापित करती हैं । (क्षिपः) = वासनाओं को अपने से परे फेंकनेवाले लोग, (दिवः) = प्रकाश के (अधिरोचने) = खूब दीप्त होनेवाले तृतीये पृष्ठे-तीर्णतम अथवा 'शरीर व हृदय' से ऊपर तीसरे मस्तिष्क के स्थान में [ आधार में] (गोभिः आवृतम्) = ज्ञानरश्मियों से आवृत हुए हुए इस सोम को (परिमृजन्ति) = शुद्ध करते हैं । वस्तुतः सोम परिशुद्धि के लिये आवश्यक है कि हम अपने खाली समय का उपयोग स्वाध्याय में करे। यह सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है और इस प्रकार सोम का सदुपयोग हो जाता है। इस सोम के द्वारा हम जीवन में सदा तृतीय भूमिका में निवास करनेवाले बन पाते हैं।
Connotation: - भावार्थ- वासनाओं से अनाकान्त होकर, सौ वर्ष तक चलने का संकल्प करके, प्रातः- सायं प्रभु का उपासन करते हुए, सोमरक्षण की प्रबल इच्छावाले बनकर, खाली समय को स्वाध्याय में बिताते हुए हम सोम का रक्षण कर पाते हैं ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (उदन्युवः) प्रीतेः (ताः) पूर्वोक्ताः (शतधाराः) शतधारा याः (असश्चतः) नानारूपेषु (अभिश्रियः) स्थितिं लभन्ते, ताः (हरिं) परमात्मानं (अव, नवन्ते) प्राप्नुवन्ति (गोभिः, आवृतं) प्रकाशपुञ्जं परमात्मानं (क्षिपः) बुद्धिवृत्तयः (मृजन्ति) विषयं कुर्वन्ति। यः परमात्मा (दिवः, तृतीये, पृष्ठे) द्युलोकस्य तृतीयके पृष्ठे विराजते। अन्यच्च (रोचने) प्रकाशस्वरूपोऽस्ति बुद्धिवृत्तयस्तं प्रकाशयन्ति ॥२७॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Those ceaseless, overflowing, bright and extensive showers of adoration in love and homage flowing in a hundred streams reach beatific Soma, light of life. Holy vibrations of mind in faith exalt the lord wrapped in sun-rays abiding in the third and highest region over the bright heaven and enshrine it in the soul. HoWI: -iMpH I