Go To Mantra

स॒हस्र॑णीथः श॒तधा॑रो॒ अद्भु॑त॒ इन्द्रा॒येन्दु॑: पवते॒ काम्यं॒ मधु॑ । जय॒न्क्षेत्र॑म॒भ्य॑र्षा॒ जय॑न्न॒प उ॒रुं नो॑ गा॒तुं कृ॑णु सोम मीढ्वः ॥

English Transliteration

sahasraṇīthaḥ śatadhāro adbhuta indrāyenduḥ pavate kāmyam madhu | jayan kṣetram abhy arṣā jayann apa uruṁ no gātuṁ kṛṇu soma mīḍhvaḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

स॒हस्र॑ऽनीथः । श॒तऽधा॑रः । अद्भु॑तः । इन्द्रा॑य । इन्दुः॑ । प॒व॒ते॒ । काम्य॑म् । मधु॑ । जय॑न् । क्षेत्र॑म् । अ॒भि । अ॒र्ष॒ । जय॑न् । अ॒पः । उ॒रुम् । नः॒ । गा॒तुम् । कृ॒णु॒ । सो॒म॒ । मी॒ढ्वः॒ ॥ ९.८५.४

Rigveda » Mandal:9» Sukta:85» Mantra:4 | Ashtak:7» Adhyay:3» Varga:10» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:4» Mantra:4


Reads 409 times

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सहस्रनीथः) आप सहस्राक्ष हैं। (शतधारः) अनेक प्रकार के आनन्दों के स्रोत हैं। (अद्भुतः) आश्चर्यमय हैं। (इन्द्राय इन्दुः) ऐश्वर्य्य के प्रकाशक हैं। (काम्यं मधु) कामनारूप मधुरता को (पवते) पवित्र करनेवाले हैं और (क्षेत्रं जयन्) इस विस्तृत ब्रह्माण्ड को वशीभूत करते हुए और (अपः जयन्) कर्म्मों को वशीभूत करते हुए (अभ्यर्ष) सम्यक् प्राप्त हों। (नो गातुं) हमारी उपासना को (उरुं कृणु) विस्तृत करें। (सोम) हे परमात्मन् ! आप सब प्रकार के आनन्दों को (मीढ्वः) सिञ्चन करनेवाले हैं ॥५॥
Connotation: - परमात्मा में ज्ञान की अनन्त शक्तियें हैं और आनन्द की अनन्त शक्तियें हैं। बहुत क्या ? सब आनन्दों की वृष्टि करनेवाला एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिये उपासकों को चाहिये कि उस सर्वैश्वर्य्यप्रद परमात्मा की उपासना करें ॥५॥
Reads 409 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सहस्रणीथः शतधारः

Word-Meaning: - [१] शरीर में (इन्द्राय) = जितेन्द्रिय पुरुष के लिये (इन्दुः) = यह सोम (पवते) = प्राप्त होता है। यह (सहस्रणीथः) = हजारों प्रकार से शरीर की क्रियाओं का प्राणयन कर रहा है, प्रत्येक नस नाड़ी में सब क्रियायें इसकी सुस्थिति पर ही निर्भर करती हैं। (शतधारः) = सैकड़ों प्रकार से यह धारण करनेवाला है। (अद्भुतः) = यह शरीर में एक अनुपम तत्त्व है। यह (काम्यं मधु) = चाहने योग्य सम्भूत वस्तु है । [२] हे (मीढ्वः) = सब शक्तियों का सेवन करनेवाले सोम, वीर्यशक्ते ! तू (जयन्) = सब रोगों व वासनाओं को पराजित करता हुआ क्(षेत्रम् अभि अर्ष) = हमारे इस शरीर के प्रति प्राप्त होनेवाला हो । हमारे लिये (अपः) = कर्मों का (जयन्) = विजय करता हुआ तू हमें प्राप्त हो । तेरी शक्ति से ही हम सब कर्मों में सफलता का लाभ करें। तू (नः) = हमारे लिये (उरुं गातुम्) = विशाल मार्ग को कृणु-कर । तेरे सुरक्षण के होने पर हम सब कार्यों को विशाल हृदयता से करनेवाले हों ।
Connotation: - भावार्थ- सोम एक अद्भुत वस्तु है। हजारों प्रकार से यह हमारा धारण कर रहा है। यह हमें नीरोग, क्रियाशील व विशाल हृदय बनाता है ।
Reads 409 times

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सहस्रनीथः) भवान् सहस्राक्षोऽसि। तथा (शतधारः) नानाविधामोदानां स्रोतः। अथ च (अद्भुतः) आश्चर्यमयोऽस्ति। (इन्द्राय, इन्दुः) ऐश्वर्यस्य प्रकाशकश्चास्ति। (काम्यं, मधुः) कामनारूपमाधुर्यं (पवते) पवित्रयति। अथ च (क्षेत्रं, जयन्) विस्तृतमिमं ब्रह्माण्डं तथा (अपः जयन्) कर्माणि च स्ववशे कुर्वन् (अभ्यर्ष) सम्यक् प्राप्तो भव। (नः, गातुं) मदीयामुपासनां (उरुं, कृणु) विस्तारयतु। (सोम) हे परमात्मन् ! भवान् विविधविधानामानन्दानां (मीढ्वः) सिञ्चन-कर्त्ताऽस्ति ॥५॥
Reads 409 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Marvellous lord of a thousand powers and possibilities, Soma, spirit of cosmic beauty and joy, flows in a thousand streams of cosmic dynamics for the human soul and brings us the honey sweets of human choice. Flow on forward, O Soma, winning fields of life’s battles for us, winning fields of karmic dynamics, broaden our paths of activity and possibility, O lord generous and omnipotent.