Go To Mantra

मृ॒जन्ति॑ त्वा॒ दश॒ क्षिपो॑ हि॒न्वन्ति॑ स॒प्त धी॒तय॑: । अनु॒ विप्रा॑ अमादिषुः ॥

English Transliteration

mṛjanti tvā daśa kṣipo hinvanti sapta dhītayaḥ | anu viprā amādiṣuḥ ||

Mantra Audio
Pad Path

मृ॒जन्ति॑ । त्वा॒ । दश॑ । क्षिपः॑ । हि॒न्वन्ति॑ । स॒प्त । धी॒तयः॑ । अनु॑ । विप्राः॑ । अ॒मा॒दि॒षुः॒ ॥ ९.८.४

Rigveda » Mandal:9» Sukta:8» Mantra:4 | Ashtak:6» Adhyay:7» Varga:30» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:4


Reads 335 times

ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (त्वा, दश, क्षिपः) तुमको पाँच सूक्ष्म भूत और पाँच स्थूलभूत (मृजन्ति) ऐश्वर्यसम्पन्न करते हैं और (सप्त, धीतयः) महदादि सात प्रकृतियें तुम्हें (हिन्वन्ति) गतिरूप से वर्णन करती हैं (अनु) इसके पश्चात् (विप्राः) मेधावी लोग आपको उपलब्ध करके (अमादिषुः) हर्षित होते हैं ॥४॥
Connotation: - पाँच सूक्ष्म और पाँच स्थूलभूत उसकी शुद्धि व ऐश्वर्य का कारण इस अभिप्राय से वर्णन किये गये हैं कि उन्हीं भूतों के कार्यरूप इन्द्रिय कर्म और ज्ञान द्वारा उसको उपलब्ध करते हैं और उस उपलब्धि को पाकर विद्वान् लोग आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Reads 335 times

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दश क्षिपः सप्त धीतयः

Word-Meaning: - [१] शरीर में दस इन्द्रियाँ हैं । वे जब व्यसनों को अपने से परे फेंकती हैं तो 'दश क्षिपः' कहलाती हैं [क्षिप्= फेंकना] । 'कर्णाविभौ नासिके चक्षणी मुखम्' ये सात जीवनयज्ञ के होता हैं, ये जब प्रभु का ध्यान करनेवाले होते हैं तो 'धीतयः' कहलाते हैं । (त्वा) = हे सोम ! तुझे (दश) = ये दस (क्षिपः) = व्यसनों को दूर फेंकनेवाली इन्द्रियाँ (मृजन्ति) = शुद्ध करती हैं। इन्द्रियाँ विषयों में न फँसी हों तो सोम शक्ति में वासनाओं का उबाल नहीं आता और वह पवित्र बनी रहती है। [२] (सप्त) = सात [दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें व वाणी ] (धीतयः) = प्रभु का ध्यान करनेवाले जीवनयज्ञ के होता (हिन्वन्ति) = तुझे शरीर में ही प्रेरित करते हैं। (अनु) = इस शरीर के अन्दर प्रेरण के अनुपात में ही (विप्राः) = ज्ञानी पुरुष (अमादिषुः) = हर्ष का अनुभव करते हैं। जितना सोमरक्षण, उतना उल्लास ।
Connotation: - भावार्थ- इन्द्रियां विषयों से रहित हों तथा प्रभु ध्यान में प्रवृत्त रहें तो सोम शरीर में सुरक्षित रहता है, तभी उल्लास का अनुभव होता है ।
Reads 335 times

ARYAMUNI

Word-Meaning: - हे परमात्मन् ! (त्वा, दश, क्षिपः) भवन्तं पञ्च सूक्ष्मभूताः पञ्च च स्थूलभूता एते दश (मृजन्ति) ऐश्वर्यवन्तं कुर्वन्ति तथा (सप्त, धीतयः) सप्त महदादिप्रकृतयः भवन्तम् (हिन्वन्ति) गतिरूपेण वर्णयन्ति (अनु) ततः (विप्राः) मेधाविनः भवन्तं साक्षात्कृत्य (अमादिषुः) प्रहृष्टा भवन्ति ॥४॥
Reads 335 times

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, human soul at peace, ten energized and energizing modes of nature, subtle and gross elements, give you the beautiful body form, and seven inspiring faculties of sense and mind inspire and move you to think and act. Thus equipped, let the wise sages provide you pleasure and enlightenment with secular and sacred literature.