क्रियाशील व प्राणसाधक को सोमकणों की प्राप्ति
Word-Meaning: - [१] (वायुम्) = गतिशील पुरुष को तथा (अश्विना) = प्राणापान की साधना करनेवाले पुरुष को (गच्छन्तः) = प्राप्त होते हुए (चमूषदः) = इस शरीर रूप चमस [पात्र] में ही स्थित होनेवाले सोमकण (पुनानासः) = हमारे जीवनों को पवित्र करते हैं। सोमकणों के रक्षण के लिये दो साधन हैं— [क] क्रिया में लगे रहना, [ख] प्राणापान की साधना करना, प्राणायाम का अभ्यासी बनना । रक्षित सोम हमारे जीवन को पवित्र बनाता है, आधि-व्याधियों से शून्य करता है । [२] (ते) = वे सोमकण (न:) = हमारे लिये (सुवीर्यम्) = उत्तम पराक्रम को (धान्तु) = धारण करें।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोमकण रोगकृमियों को कम्पित करके दूर करनेवाले होते हैं ।