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अ॒द्भिः सो॑म पपृचा॒नस्य॑ ते॒ रसोऽव्यो॒ वारं॒ वि प॑वमान धावति । स मृ॒ज्यमा॑नः क॒विभि॑र्मदिन्तम॒ स्वद॒स्वेन्द्रा॑य पवमान पी॒तये॑ ॥

English Transliteration

adbhiḥ soma papṛcānasya te raso vyo vāraṁ vi pavamāna dhāvati | sa mṛjyamānaḥ kavibhir madintama svadasvendrāya pavamāna pītaye ||

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Pad Path

अ॒त्ऽभिः । सो॒म॒ । प॒पृ॒चा॒नस्य॑ । ते॒ । रसः॑ । अव्यः॑ । वार॑म् । वि । प॒व॒मा॒न॒ । धा॒व॒ति॒ । सः । मृ॒ज्यमा॑नः । क॒विऽभिः॑ । म॒दि॒न्ऽत॒म॒ । स्वद॑स्व । इन्द्रा॑य । प॒व॒मा॒न॒ । पी॒तये॑ ॥ ९.७४.९

Rigveda » Mandal:9» Sukta:74» Mantra:9 | Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:32» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:4» Mantra:9


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (अद्भिः) सत्कर्मों से (पपृचानस्य) अभिव्यक्त (ते) आपका (रसः) आनन्द (अव्यः) जो सर्वरक्षक है, वह (वारं) वरणीय पुरुष के प्रति (वारम्) विशेषरूप से प्राप्त होता है। (विधावति) सबको पवित्र करनेवाले (पवमान) परमात्मन् ! आप (कविभिः) विद्वानों से (मृज्यमानः) साक्षात्कृत हैं और (पवमान) पवित्र करनेवाले हैं और (मदिन्तम) सबको आह्लादकारक आप (इन्द्राय) कर्मयोगी की (पीतये) तृप्ति के लिये (स्वदस्व) प्रियकारक हों ॥९॥
Connotation: - जो लोग कर्मयोग से अपने को पवित्र बनाते हैं, उनके लिये परमात्मा अवश्यमेव अपने ब्रह्मामृत का प्रदान करते हैं ॥९॥ यह ७४ वाँ सूक्त और ३२ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

स्वदस्व इन्द्राय पवमान पीतये

Word-Meaning: - [१) हे सोम-वीर्यशक्ते ! अद्भिः कर्मों के द्वारा पपृचानस्य शरीर से खूब सम्पृत होते हुए ते रसः-तेरा रस अव्यः - रक्षण में उत्तम है । सोम से बढ़कर रक्षा करनेवाली और कोई वस्तु नहीं । हे पवमान=पवित्र करनेवाले सोम! आप वारम्-वासनाओं का निवारण करनेवाले पुरुष को विधावति = विशेषरूप से प्राप्त होते हो । [२) सः वह सोम कविभिः = क्रान्तदर्शी ज्ञानियों से मृज्यमानः = शुद्ध किया जाता हुआ मदिन्तमः अतिशयेन आनन्दित करनेवाला होता है। हे पवमान = पवित्र करनेवाले सोम ! तू इन्द्राय - जितेन्द्रिय पुरुष के लिये स्वदस्व - जीवन को मधुर बनानेवाला हो और पीतये तू उसके रक्षण के लिये हो । - भावार्थ- सोमरक्षण का साधन है- 'कर्मों में लगे रहना', 'ज्ञान प्राप्ति में रत रहना' और
Connotation: - 'इस प्रकार वासनाओं का निवारण करना'। यह सोम हमें आनन्दित करता है, जीवन को मधुर बनाता है तथा हमारा रक्षण करता है। सोमरक्षण के द्वारा यह 'कवि' बनता है, क्रान्तदर्शी तत्त्वद्रष्टा होता है। यह 'कवि' सोम शंसन करता हुआ कहता है-
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (अद्भिः) सद्भिः कर्मभिः (पपृचानस्य) अभिव्यक्तस्य (ते) तव (रसः) आनन्दः यः (अव्यः) सर्वरक्षकोऽस्ति सः (वारम्) वरणीयं पुरुषं प्रति (विधावति) विशेषरूपेण प्राप्तो भवति। (पवमान) सर्वपवित्रयितः परमात्मन् ! भवान् (कविभिः) विद्वद्भिः (मृज्यमानः) साक्षात्कृतोऽस्ति तथा (पवमान) पवितास्ति। (मदिन्तम) सर्वानन्दस्त्वं (इन्द्राय) कर्मयोगिनः (पीतये) तृप्तये (स्वदस्व) प्रियकारको भव ॥९॥ इति चतुस्सप्ततितमं सूक्तं द्वात्रिंशो वर्गश्च समाप्तः ॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - O Soma, lord of light and bliss, pure and purifying, lover of life with showers of living consecrating nectar, the immortal bliss of your presence flows to the chosen soul of humanity. As such, celebrated and exalted by poets, O Spirit immaculate most ecstatic, pray flow and be sweet and gracious for the delight and fulfilment of Indra, virile soul of pious humanity.