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त्वे॒षं रू॒पं कृ॑णुते॒ वर्णो॑ अस्य॒ स यत्राश॑य॒त्समृ॑ता॒ सेध॑ति स्रि॒धः । अ॒प्सा या॑ति स्व॒धया॒ दैव्यं॒ जनं॒ सं सु॑ष्टु॒ती नस॑ते॒ सं गोअ॑ग्रया ॥

English Transliteration

tveṣaṁ rūpaṁ kṛṇute varṇo asya sa yatrāśayat samṛtā sedhati sridhaḥ | apsā yāti svadhayā daivyaṁ janaṁ saṁ suṣṭutī nasate saṁ goagrayā ||

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Pad Path

त्वे॒षम् । रू॒पम् । कृ॒णु॒ते॒ । वर्णः॑ । अ॒स्य॒ । सः । यत्र॑ । अश॑यत् । सम्ऽऋ॑ता । सेध॑ति । स्रि॒धः । अ॒प्साः । या॒ति॒ । स्व॒धया॑ । दैव्य॑म् । जन॑म् । सम् । सु॒ऽस्तु॒ती । नस॑ते । सम् । गोऽअ॑ग्रया ॥ ९.७१.८

Rigveda » Mandal:9» Sukta:71» Mantra:8 | Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:26» Mantra:3 | Mandal:9» Anuvak:4» Mantra:8


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सोमः) परमात्मा (रूपं) रूप को (त्वेषं) दीप्यमान (कृणुते) करता है। (वर्णः) वरणीय (सः) वह परमात्मा (यत्र) जिस (समृता) संग्राम में (अशयत्) स्थिर होता है, (अस्य) उसमें (स्रिधः) दुष्टों को (सेधति) मारता है। (दैव्यं जनं) दिव्य शक्तिवाले मनुष्य को वह (अप्साः) सत्कर्मों का दाता (सुष्टुती) सुन्दर स्तुतियोग्य परमात्मा (स्वधया) अपने आनन्द से (याति) परिपूर्ण है और (गो अग्रया) वेदवाणी से (सं नसते) सर्वत्र संगत होता है ॥८॥
Connotation: - इस मन्त्र में इस बात का वर्णन किया गया है कि परमात्मा प्रत्येक रूप से प्रदीप्त करनेवाला है। उसी की सत्ता से सम्पूर्ण पदार्थ स्थिर हैं और स्वयं वह निर्लेप होकर इन सब चीजों में विराजमान है ॥८॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

कर्म-स्तुति - स्वाध्याय

Word-Meaning: - [१] (अस्य) = इस सोम का (वर्णः) = वरण करनेवाला व्यक्ति (त्वेषं रूपं कृणुते) = दीप्त रूप को बनाता है । सोमरक्षण द्वारा यह तेजस्वी बनता है। (सः) = वह सोम (यत्र आशयत्) = जहाँ निवास करता है, वहाँ (समृता) = संग्राम में (स्त्रिधः) = हिंसक शत्रुओं को, काम-क्रोध-लोभ आदि को (सेधति) = दूर करता है [= नष्ट करता है] । [२] (अप्सः) = कर्मों का सेचन करनेवाला, निरन्तर कर्मों में लगा हुआ यह सोमरक्षक पुरुष स्वधया आत्मतत्त्व के धारण के हेतु से (दैव्यं जनम्) = देववृत्तिवाले लोगों को (याति) = जाता है । इन देववृत्तिवाले लोगों के सम्पर्क में इसकी चित्तवृत्ति विषय-प्रवण न होकर आत्मतत्त्व की ओर झुकाववाली होती है। यह (सुष्टुती सं नसते) = उत्तम स्तुति के साथ संगत होता है तथा (गोअग्रया) = सृष्टि के प्रारम्भ में दी जानेवाली इस वेदवाणी रूप गौ से (सम्) = संगत होता है । इस वाणी के सम्पर्क में अपने ज्ञान को उत्तरोत्तर बढ़ाता है ।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से हम दीप्त जीवनवाले व जीवन संग्राम में जीतनेवाले होंगे। कर्मशील व सदा उत्तम संग वाले बनें । सदा स्तुति व स्वाध्याय में प्रवृत्त होंगे।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सोमः) परमात्मा (रूपम्) स्वरूपं (त्वेषम्) दीप्यमानं (कृणुते) करोति (वर्णः) वरणीयः (सः) असौ परमेश्वरः (यत्र) यस्मिन् (समृता) रणे (अशयत्) स्थिरो भवति (अस्य) तत्र (स्रिधः) दुष्टान् (सेधति) हिनस्ति। (दैव्यं जनम्) दिव्यशक्तिमन्तं पुरुषं (अप्साः) सुकर्मदः (सुष्टुती) स्तुतियोग्यो जगदीशः (स्वधया) स्वानन्दवृष्ट्या (याति) परिपूर्णोऽस्ति। अथ च (गो अग्रया) वेदवाण्या (सं नसते) सर्वत्र सङ्गतो भवति ॥८॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Its form assumes a lustrous character of blazing refulgence, and wherever it reflects, shines and abides, there in the battles of human life and existence it destroys negativities and inner conflicts. Commanding the dynamic powers of life with its innate potential it goes to the pious celebrant and abides there in the heart adored with the highest words of exaltation.