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परि॒ यत्काव्या॑ क॒विर्नृ॒म्णा वसा॑नो॒ अर्ष॑ति । स्व॑र्वा॒जी सि॑षासति ॥

English Transliteration

pari yat kāvyā kavir nṛmṇā vasāno arṣati | svar vājī siṣāsati ||

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Pad Path

परि॑ । यत् । काव्या॑ । क॒विः । नृ॒म्णा । वसा॑नः । अर्ष॑ति । स्वः॑ । वा॒जी । सि॒सा॒स॒ति॒ ॥ ९.७.४

Rigveda » Mandal:9» Sukta:7» Mantra:4 | Ashtak:6» Adhyay:7» Varga:28» Mantra:4 | Mandal:9» Anuvak:1» Mantra:4


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - वह परमात्मा (कविः) सर्वज्ञ है “कवते जानाति सर्वमिति कविः” जो सबको जाने, उसका नाम कवि है और (नृम्णा) ऐश्वर्यों को (वसानः) धारण करनेवाला (पर्यर्षति) सर्वत्र प्राप्त है (स्वर्वाजी) आनन्दरूप बलवाला है तथा (काव्या सिषासति) कवित्वरूप कर्मों के प्रचार की इच्छा करता है ॥४॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

काव्य व नृम्ण' का 'धारण

Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार सोमरक्षण करनेवाला पुरुष (कविः) = क्रान्तर्शी, तत्त्वज्ञानी बनता है । यह (यत्) = जब (काव्या) = ज्ञानों को व (नृम्णा) = बलों को (वसानः) = धारण करता हुआ (परि अर्षति) = चारों ओर अपने कर्त्तव्य कर्मों में गतिवाला होता है। तो (वाजी) = [वाज Sacrifice] त्याग की वृत्तिवाला होता हुआ (स्वः सिषासति) = प्रकाशमय ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। [२] सोमरक्षण से रोगकृमियों का विनाश होकर बल बढ़ता है। रक्षित सोम ज्ञानाग्नि का ईंधन बनता है, ज्ञानाग्नि की दीप्ति होकर हम क्रान्तदर्शी बनते हैं। इस तत्त्वदर्शन से हमारे में त्याग की भावना पैदा होती है। यह त्याग की भावना हमें ब्रह्मलोक को प्राप्त कराती है।
Connotation: - भावार्थ- सोमरक्षण से नीरोगता-ज्ञानवृद्धि-त्याग की भावना व ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - स परमात्मा (कविः) सर्वज्ञः (नृम्णा) ऐश्वर्यम् (वसानः) धारयति (पर्यर्षति) सर्वगतिरस्ति (स्वर्वाजी) आनन्दमयबलवान् तथा (काव्या सिषासति) कविकर्माणि प्रचिचारयिषति ॥४॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - When the poetic spirit of omniscience wrapped in glory moves and inspires the vision and imagination of the poet, the creative spirit flies to the heavens and celebrates divinity in poetry.