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वि यो म॒मे य॒म्या॑ संय॒ती मद॑: साकं॒वृधा॒ पय॑सा पिन्व॒दक्षि॑ता । म॒ही अ॑पा॒रे रज॑सी वि॒वेवि॑ददभि॒व्रज॒न्नक्षि॑तं॒ पाज॒ आ द॑दे ॥

English Transliteration

vi yo mame yamyā saṁyatī madaḥ sākaṁvṛdhā payasā pinvad akṣitā | mahī apāre rajasī vivevidad abhivrajann akṣitam pāja ā dade ||

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Pad Path

वि । यः । म॒मे । य॒म्या॑ । सं॒य॒ती इति॑ स॒म्ऽय॒ती । मदः॑ । सा॒का॒म्ऽवृधा॑ । पय॑सा । पिन्व॑त् । अक्षि॑ता । म॒ही इति॑ । अ॒पा॒रे इति॑ । रज॑सी॒ इति॑ । वि॒ऽवेवि॑दत् । अ॒भि॒ऽव्रज॑न् । अक्षि॑तम् । पाजः॑ । आ । द॒दे॒ ॥ ९.६८.३

Rigveda » Mandal:9» Sukta:68» Mantra:3 | Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:19» Mantra:3 | Mandal:9» Anuvak:4» Mantra:3


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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यो मदः) जो आनन्द का वर्धक कर्मयोगी (यम्या) युगल (संयती) परस्पर सम्बद्ध पृथिवीलोक और द्युलोक के ज्ञान को (विममे) उत्पन्न करता है और (साकं) साथ ही (पयसा वृधा) ऐश्वर्य से बढ़ा हुआ (अक्षिता) अक्षीण द्युलोक (रजसी) जो आकर्षणशील है, उसको ज्ञान द्वारा (विवेविदत्) व्यक्त करता है। तथा (अभिव्रजन्) अव्याहतगति होता हुआ (अक्षितं पाज आददे) क्षयरहित बल को देता है ॥३॥
Connotation: - कर्मयोगी विद्वान् के उपदेश से ही मनुष्य को पृथिवीलोक और द्युलोक का ज्ञान होता है और उसी के सदुपदेश से अक्षय फल मिलता है ॥३॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

अक्षीण शक्तिवाले 'मस्तिष्क व शरीर'

Word-Meaning: - [१] (यः) = जो (मदः) = उल्लास का जनक सोम (यम्या) = युगलभूत (संयती) = [संगच्छमाने] मिलकर चलनेवाले, (साकंवृधा) = साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होनेवाले द्युलोक व पृथिवीलोक को, मस्तिष्क व शरीर को (विममे) = बनाता है । इन्हें (पयसा) = अपने रस से (पिन्वत्) = सींचता है, और इस प्रकार (अक्षिता) = न क्षीण हुए हुए (मही) = अत्यन्त महत्त्ववाले अपारे अद्भुत शक्तिवाले (रजसा) = द्यावापृथिवी को (विवेविदत्) = हमारे लिये प्राप्त कराता है। [२] (अभिव्रजन्) = शरीर में चारों ओर गति करता हुआ सोम (अक्षितम्) = न क्षीण होनेवाले (पाजः) = बल को आददे स्वीकार करता है। अर्थात् हमारे में यह अक्षीण बल को धारण करता है । सोम से हमारी शक्ति बनी रहती है और जीवन नष्ट नहीं होता ।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम मस्तिष्क व शरीर को अक्षीण शक्ति बनाये रखता है ।
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ARYAMUNI

Word-Meaning: - (यो मदः) यो ह्यानन्दवर्धकः कर्मयोगी (यम्या) युगलस्य (संयती) मिथः सम्बद्धस्य पृथिवीलोकस्य द्युलोकस्य च ज्ञानम् (विममे) उत्पादयति अथ च (साकम्) सहैव (पयसावृधा) ऐश्वर्येणाभ्युदयङ्गतानि   (अक्षिता) अक्षीणानि द्युलोकज्ञानानि (पिन्वत्) वर्धयति। अथ च पूर्वोक्तविद्वान् (रजसी) आकर्षणशीले (मही अपारे) पाररहितद्यावापृथिव्यौ ज्ञानेन (विवेविदत्) व्यक्तयति। तथा (अभिव्रजन्) अप्रतिहतगतिः सन् (अक्षितं पाज आददे) अनश्वरं बलं ददाति ॥३॥
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DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - The lord grants that soma joy of divinity which, going over and pervading the great and boundless heaven and earth, energises, vitalises and expands the inviolable twin sisters growing together in glory, with the milky spirit of divinity, and which, thus going forward unobstructed, holds the imperishable power and bliss of divinity.