Word-Meaning: - [१] गत मन्त्र के अनुसार प्रभु की उपासना करने पर (अलाय्यस्य) = [ an assailing enemy] आक्रमण करनेवाले शत्रु का (परशुः) = कुठार (ननाश) = नष्ट हो जाये। जब हम प्रभु की उपासना करते हैं, तो आक्रमण करनेवाले काम-क्रोध आदि शत्रुओं की टक्कर हृदयस्थ प्रभु से ही होती है। प्रभु से टकराकर ये नष्ट हो जाते हैं। इनके अस्त्र प्रभु पर टकराकर नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार हे (देव) = प्रकाशमय (सोम) = शान्त प्रभो! (तम्) = उस अपने उपासक को आपवस्व = सर्वथा पवित्र जीवनवाला बनाइये। [२] हे (देव सोम) = प्रकाशमय शान्त प्रभो! आप (आखुं चित् एव) = इस [आ खनति] विषय वासनाओं को उखाड़ देनेवाले इस व्यक्ति को (ही) = निश्चय से प्राप्त होते हैं। विषय वासनाओं से शून्य हृदय वह आसन होता है, जो प्रभु के आसीन होने के लिये उपयुक्ततम है ।
Connotation: - भावार्थ- हम प्रभु की उपासना करते हैं, तो हमारे शत्रुओं के अस्त्र कुण्ठित हो जाते हैं । हम 'आखु' बन पाते हैं ।