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ताभ्यां॒ विश्व॑स्य राजसि॒ ये प॑वमान॒ धाम॑नी । प्र॒ती॒ची सो॑म त॒स्थतु॑: ॥

English Transliteration

tābhyāṁ viśvasya rājasi ye pavamāna dhāmanī | pratīcī soma tasthatuḥ ||

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Pad Path

ताभ्य॑म् । विश्व॑स्य । रा॒ज॒सि॒ । ये । प॒व॒मा॒न॒ । धाम॑नी॒ इति॑ । प्र॒ती॒ची इति॑ । सो॒म॒ । त॒स्थतुः॑ ॥ ९.६६.२

Rigveda » Mandal:9» Sukta:66» Mantra:2 | Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:7» Mantra:2 | Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:2


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सोम) हे परमात्मन् ! आप (ताभ्याम्) ज्ञान और कर्म दोनों द्वारा (विश्वस्य) सम्पूर्ण विश्व का (राजसि) प्रकाश करते हैं। (पवमान) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (ये धामनी) जो ज्ञान कर्म (प्रतीची) प्राचीन हैं, वे (तस्थतुः) हममें विराजमान हों ॥२॥
Connotation: - परमात्मा सब लोक-लोकान्तरों में विराजमान है। ज्ञान क्रिया और बल ये तीनों प्रकार के उसके प्राचीन धाम हैं, जिनसे वह सबको प्रेरणा करता है ॥२॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

दो तेज

Word-Meaning: - [१] हे (पवमान) - पवित्र करनेवाले (सोम) = सोम [वीर्यशक्ते] (ये) = जो (धामनी) = तेरे तेज (प्रतीची) = हमारे अन्दर गतिवाले होकर (तस्थतुः) = स्थित होते हैं, शरीर में तेजस्विता के रूप से तथा मस्तिष्क में ज्ञानदीति के रूप से, (ताभ्याम्) = उन तेजों से (विश्वस्य राजसि) = सबका तू दीप्त करनेवाला होता है अथवा सबका तू शासक होता है। शरीर में तेजस्विता के द्वारा तू रोगकृमियों का संहार करके शरीर को अपने शासन में रखता है तथा मस्तिष्क की तेजस्विता से तू काम- क्रोध-लोभ आदि वासनाओं को दग्ध करके मन का शासन करनेवाली मनीषा [बुद्धि] वाला होता है । [२] शरीर में सुरक्षित सोम शरीर को तेजस्विता से युक्त करता है, मस्तिष्क को ज्ञानदीप्ति से । ये दोनों ही तेज एक दूसरे का पूरण करते हुए शरीर में दीप्ति को प्राप्त कराते हैं ।
Connotation: - भावार्थ- सोम शरीर में सुरक्षित होकर तेजस्विता व ज्ञानदीप्ति से पवित्रता का संचार करता हैं ।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (सोम) हे परमेश्वर ! भवान् (ताभ्याम्) कर्मज्ञानाभ्यां (विश्वस्य) समस्तसंसारस्य (राजसि) प्रकाशं करोति (पवमान) सर्वपवित्रयितः परमात्मन् ! (ये धामनी) ज्ञानकर्मणी (प्रतीची) प्राचीने स्तः ते (तस्थतुः) उपजग्मतुः ॥२॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Vibrant Soma, pure and purifying, by those two media of yours, omniscience of knowledge and omnipotence of action, you shine, illuminate and rule the world both of which too abide as eternal complementarities of nature and divine power.