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अर्षा॑ सोम द्यु॒मत्त॑मो॒ऽभि द्रोणा॑नि॒ रोरु॑वत् । सीद॑ञ्छ्ये॒नो न योनि॒मा ॥
English Transliteration
Mantra Audio
arṣā soma dyumattamo bhi droṇāni roruvat | sīdañ chyeno na yonim ā ||
Pad Path
अर्ष॑ । सो॒म॒ । द्यु॒मत्ऽत॑मः । अ॒भि । द्रोणा॑नि । रोरु॑वत् । सीद॑न् । श्ये॒नः । न । योनि॑म् । आ ॥ ९.६५.१९
Rigveda » Mandal:9» Sukta:65» Mantra:19
| Ashtak:7» Adhyay:2» Varga:4» Mantra:4
| Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:19
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (सोम) हे परमात्मन् ! आप (श्येनः) विद्युत् के (न) समान गतिशील हैं। (द्रोणानि) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों में (रोरुवत्) गतिशील होकर आप सर्वत्र विराजमान हैं और (द्युमत्तमः) आप स्वयंप्रकाश हैं। (योनिं) हमारे हृदयस्थान में (आसीदन्) विराजमान होकर (अभ्यर्ष) हमारे हृदय को शुद्ध करें ॥१९॥
Connotation: - परमात्मा स्वयंप्रकाश है और उसी के प्रकाश से सब पदार्थ प्रकाशित होते हैं ॥१९॥
HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
द्युमत्तमः- रोरुवत् श्येनः
Word-Meaning: - [१] हे (सोम) = वीर्यशक्ते ! (द्युमत्तमः) = अतिशयेन ज्योतिर्मयी होती हुई तू (द्रोणानि अभि) = इन शरीर पात्रों की ओर (अर्ष) = गतिवाली हो। तेरा शरीर में ही व्यापन हो । शरीरस्थ होकर तू (रोरुवत्) = खूब ही उस प्रभु के नामों का उच्चारण करनेवाली हो । सोमरक्षण से प्रभु-स्तवन की वृत्ति तो उत्पन्न होती ही है । [२] तू (श्येनः न) = शंसनीय गतिवाले के समान होता हुआ, शुभकर्मों में प्रवृत्त हुआ हुआ (योनिम्) = अपने उत्पत्ति-स्थान में ही (आसीदन्) = स्थित होनेवाला हो । सोम शरीर में उत्पन्न होता है, यह शरीर में ही स्थित हो । वस्तुतः तभी यह शंसनीय गतिवाला, प्रशस्त कर्मोंवाला होता है । सोमरक्षण करनेवाला पुरुष कभी अशुभ कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता ।
Connotation: - भावार्थ- सोम ज्योतिर्मय, स्तुतिमय व शंसनीय गतिवाला है। 'द्युमत्तमः' से ज्ञानकाण्ड का संकेत है, 'रोरुवत्' से उपासना काण्ड का तथा 'श्येनः ' से कर्मकाण्ड का । सोम हमारे तीनों काण्डों को प्रशस्त करता है ।
ARYAMUNI
Word-Meaning: - (सोम) हे परमात्मन् ! भवान् (श्येनो न) विद्युदिव गतिशीलोऽस्ति। (द्रोणानि) समस्तलोकेषु (रोरुवत्) गतिशीलः सन् सर्वत्र विराजितो भवतु। तथा (द्युमत्तमः) भवान् स्वयंप्रकाशोऽस्ति। अथ च (योनिं) मदन्तःकरणेषु (आसीदन्) विराजमानः (अभ्यर्ष) मम हृदयं पवित्रयतु ॥१९॥
DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Soma, spirit of divine power and peace of purity, most potent and most refulgent, come roaring at the speed and force of thunder and abide in the heart of the faithful celebrant like the eagle in its nest, purify and sanctify the soul.
