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शु॒म्भमा॑ना ऋता॒युभि॑र्मृ॒ज्यमा॑ना॒ गभ॑स्त्योः । पव॑न्ते॒ वारे॑ अ॒व्यये॑ ॥

English Transliteration

śumbhamānā ṛtāyubhir mṛjyamānā gabhastyoḥ | pavante vāre avyaye ||

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Pad Path

शु॒म्भमा॑नाः । ऋ॒त॒युऽभिः॑ । मृ॒ज्यमा॑नाः । गभ॑स्त्योः । पव॑न्ते । वारे॑ । अ॒व्यये॑ ॥ ९.६४.५

Rigveda » Mandal:9» Sukta:64» Mantra:5 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:36» Mantra:5 | Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:5


ARYAMUNI

Word-Meaning: - (शुम्भमानाः) सब भूषणों का भूषक (मृज्यमानाः) सबको शुद्ध करनेवाला (गभस्त्योः) प्रकाशस्वरूप (वारे) वरणीय पदार्थों में (अव्यये) अव्ययरूप से जो विराजमान है, ऐसा परमात्मा (ऋतायुभिः) सचाई को चाहनेवाले लोगों से उपासना किया हुआ परमात्मा (पवन्ते) उनको पवित्र करता है ॥५॥
Connotation: - जो लोग सत्य के अभिलाषी हैं, उनको परमात्मा सदैव पवित्र करता है। क्योंकि परमात्मा भक्तों पर और सत्याभिलाषियों पर अपनी कृपा करके उनका उद्धार करता है ॥५॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

सोम का अलंकरण व शोधन

Word-Meaning: - [१] (ऋतायुभिः) = यज्ञ की कामनावाले पुरुषों से ये सोम (शुम्भमाना:) = अलंक्रियमाण होते हैं। यज्ञों में लगे रहने से, नियमपूर्वक उत्तम कर्मों में व्यापृत रहने से सोम शरीर में ही सुरक्षित रहता है और इसे अलंकृत करनेवाला बनता है । ये सोम (गभस्त्यो:) = बाहुवों में (मृज्यमानाः) = शुद्ध किये जाते हैं। अभ्युदय व निःश्रेयस के लिये किये जानेवाले प्रयत्नों में शुद्ध किये जाते हैं। जब हम इन प्रयत्नों में लगे रहते हैं तो विषय-वासनाओं की ओर झुकाव न होने से ये सोम पवित्र बने रहते हैं । [२] ये सोम (वारे) = विषय-वासनाओं का निवारण करनेवाले (अव्यये) = [अ-वि-अय] इधर-उधर न भटकनेवाले पुरुष में (पवन्ते) = प्राप्त होते हैं। सोम उसी में सुरक्षित रहते हैं जो कि अपनी चित्तवृत्ति को विषयों से रोककर इधर-उधर भटकने नहीं देता ।
Connotation: - भावार्थ- हम ऋतायु बनकर सोम को शरीर में ही अलंकृत करें। अभ्युदय व निःश्रेयस प्राप्ति की क्रियाओं में लगे हुए इसे शुद्ध बनायें ।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - (शुम्भमानाः) भूषणभूषकः (मृज्यमानाः) सर्वपवित्रकारी (गभस्त्योः) प्रकाशस्वरूपः (वारे) वरणीयपदार्थेषु (अव्यये) अव्ययरूपेण विराजमानः परमात्मा (ऋतायुभिः) सत्यप्रियैः उपासितः (पवन्ते) तान् पवित्रयति ॥५॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Blest and beatified by lovers of truth and divine law, seasoned and tempered by light of the sun and heat of fire, heroic men of the soma spirit of peace and prosperity work vibrant on choice positions in the imperishable order of divine existence.