ऐश्वर्य द्वारों का उद्घाटन
Word-Meaning: - [१] (वृषा) = हे सोम ! तू हमारे लिये सुखवर्षक है। (अश्वः न) = शक्तिशाली के समान तू (चक्रदः) = उस प्रभु को पुकारता है, हमें शक्तिशाली बनाता हुआ प्रभु के स्तवन की वृत्तिवाला बनाता है । [२] हे (इन्दो) = हमें शक्तिशाली बनानेवाले सोम ! तू (गाः) = ज्ञानेन्द्रियों को (सम्) = हमारे साथ संगत कर । (अर्वतः) = कर्मेन्द्रियों को (सम्) = हमारे साथ संगत कर । सोमरक्षण से हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ उत्तम हों। [३] हे सोम ! तू (नः) = हमारे (राये) = ऐश्वर्य के लिये (दुरः) = द्वारों को (विवृधि) = खोल डाल । तेरे द्वारा हमारे अन्नमय आदि सब कोश तेजस्विता आदि ऐश्वर्यों से परिपूर्ण बनें।
Connotation: - भावार्थ- सोम हमारा ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को बलवान् बनाता है।