प्र हि॑न्वा॒नास॒ इन्द॒वोऽच्छा॑ समु॒द्रमा॒शव॑: । धि॒या जू॒ता अ॑सृक्षत ॥
English Transliteration
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pra hinvānāsa indavo cchā samudram āśavaḥ | dhiyā jūtā asṛkṣata ||
Pad Path
प्र । हि॒न्वा॒नासः॑ । इन्द॑वः । अच्छ॑ । स॒मु॒द्रम् । आ॒शवः॑ । धि॒या । जू॒ताः । अ॒सृ॒क्ष॒त॒ ॥ ९.६४.१६
Rigveda » Mandal:9» Sukta:64» Mantra:16
| Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:39» Mantra:1
| Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:16
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (धिया) संस्कृत बुद्धि से (जूताः) उपासना किया हुआ (आशवः) गतिशील (अच्छा) निर्मल परमात्मा (समुद्रम्) द्रवीभूत मन से (प्रासृक्षत) ध्यान को लक्ष्य बनाता है। उक्त परमात्मा (इन्दवः) सब प्रकार ऐश्वर्यवाला है तथा (हिन्वानासः) सबकी प्रेरणा करनेवाला है ॥१६॥
Connotation: - सर्वप्रकाशक और सबका प्रेरक परमात्मा संयमी पुरुषों के ध्यान का विषय होता है, अन्यों के नहीं ॥१६॥
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HARISHARAN SIDDHANTALANKAR
अच्छा समुद्रम्
Word-Meaning: - [१] (प्र हिन्वानासः) = प्रकर्षेण शरीर में प्रेरित किये जाते हुए (इन्दवः) = सोमकण (समुद्रं अच्छा) = उस आनन्दमय प्रभु की ओर हमें ले चलनेवाले होते हैं। हम इन सोमकणों का रक्षण करते हैं, तो ये हमें दिव्य गुणों की ओर ले चलते हुए अन्ततः उस आनन्दमय प्रभु को प्राप्त करानेवाले होते हैं । [२] ये (आशवः) = शीघ्रता से कार्यों में व्याप्त होनेवाले सोम, हमें कार्यों को स्फूर्ति से करानेवाले सोम (धिया) = बुद्धि के हेतु से (जूता:) = शरीर में प्रेरित हुए हुए (असृक्षत) = उत्पन्न किये जाते हैं। प्रभु ने इन सोमकणों को इसलिए उत्पन्न किया है कि ये शरीर में स्थित हुए हुए ज्ञानाग्नि का प्रभु ईंधन बनें। हमें सूक्ष्म बुद्धि को प्राप्त करानेवाले हों। इस सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा हम उस आनन्दमय का दर्शन कर पायें।
Connotation: - भावार्थ - सामान्यतः सोम का रुधिर में ही व्यापन होता है, वासनाओं की अग्नि ही इसे विनष्ट करनेवाली बनती है। प्रभु ने इन्हें शरीर में इसलिए प्रेरित किया है कि हम सूक्ष्म बुद्धि बनकर प्रभु की ओर जानेवाले हों ।
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ARYAMUNI
Word-Meaning: - (धिया) संस्कृतबुद्ध्या (जूताः) उपासितः (आशवः) गतिशीलः (अच्छ) निर्मलः परमात्मा (समुद्रम्) द्रवीभूते मनसि (प्रासृक्षत) ध्यानविषयो भवति। पूर्वोक्तः परमेश्वरः (इन्दवः) सर्वविधैश्वर्यवानस्ति। तथा (हिन्वानासः) सर्वप्रेरकोऽस्ति ॥१६॥
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DR. TULSI RAM
Word-Meaning: - Soma songs of adoration, inspired streams of the joyous spirit of poetry, bright and energetic, move to infinite divinity and, energised by thought, pleasure and awareness, flow in concentration to Indra, omnipotent soul.
