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पव॑माना दि॒वस्पर्य॒न्तरि॑क्षादसृक्षत । पृ॒थि॒व्या अधि॒ सान॑वि ॥

English Transliteration

pavamānā divas pary antarikṣād asṛkṣata | pṛthivyā adhi sānavi ||

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Pad Path

पव॑मानाः । दि॒वः । परि॑ । अ॒न्तरि॑क्षात् । अ॒सृ॒क्ष॒त॒ । पृ॒थि॒व्याः । अधि॑ । सान॑वि ॥ ९.६३.२७

Rigveda » Mandal:9» Sukta:63» Mantra:27 | Ashtak:7» Adhyay:1» Varga:35» Mantra:2 | Mandal:9» Anuvak:3» Mantra:27


ARYAMUNI

Word-Meaning: - जो शूरवीर (दिवस्परि) द्युलोक से ऊपर (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष और (पृथिव्याः अधि) पृथिवीलोक के बीच में (सानवि) शूरवीरता धर्म से सर्वोपरि होकर विराजमान हैं, वे (पवमानाः) स्वयं पवित्र होकर (असृक्षत) शुभगुणों को उत्पन्न करते हैं ॥२७॥
Connotation: - परमात्मा उपदेश करते हैं कि पुरुषो ! तुम अपने शूरवीरतादि धर्मों से इस संसार के उच्च शिखर पर विराजमान होकर सबकी रक्षा करो ॥२७॥

HARISHARAN SIDDHANTALANKAR

त्रिलोकी का रक्षण

Word-Meaning: - [१] (पवमाना:) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले ये सोम ! (दिवः परि) = द्युलोक के लक्ष्य से (असृक्षत) = उत्पन्न किये जाते हैं। 'सुरक्षित हुए हुए ये मस्तिष्क रूप द्युलोक को ज्ञानोज्ज्वल बनाते हैं' इसलिए इनका उत्पादन होता है। [२] (अन्तरिक्षात्) = हृदयान्तरिक्ष के दृष्टिकोण से इनका उत्पादन होता है । उत्पन्न हुए हुए ये सोमकण हृदयान्तरिक्ष को बड़ा पवित्र बनाते हैं । [३] (पृथिव्या:) = इस शरीररूप पृथिवी के (अधिसानवि) = समुच्छ्रित प्रदेश के निमित्त यह सोम उत्पन्न किया जाता है। सुरक्षित हुआ हुआ यह सोम हमारे शरीर को खूब उन्नत स्वास्थ्य की स्थिति में रखता है।
Connotation: - भावार्थ - शरीर में सुरक्षित सोम 'मस्तिष्क, हृदय व स्थूल शरीर' रूप त्रिलोकी को बड़ा ठीक रखता है ।

ARYAMUNI

Word-Meaning: - शूरादयः (दिवस्परि) द्युलोकादुपरि (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्षतः तथा (पृथिव्याः अधि) पृथ्वीलोकस्य मध्ये (सानवि) शौर्येण सर्वोपरि विराजते ते वीराः (पवमानाः) स्वयं पवित्रीभूय (असृक्षत) शुभगुणमुत्पादयन्ति ॥२७॥

DR. TULSI RAM

Word-Meaning: - Pure and purifying Somas, evolutionary powers of nature, divinity and humanity, creative, protective and defensive, are created from the regions of light above, the middle regions and the earth and, on top of the course of evolution and progress, they remain ever active for life in the service of divinity.